बीमारी का बगैर दवाई भी इलाज़ है,मगर मौत का कोई इलाज़ नहीं दुनियावी हिसाब किताब है कोई दावा ए खुदाई नहीं लाल किताब है ज्योतिष निराली जो किस्मत सोई को जगा देती है फरमान दे के पक्का आखरी दो लफ्ज़ में जेहमत हटा देती है

Thursday, 18 August 2016

यदि किसी कारणवश अपना घर नहीं बनवा पा रहे ? यह उपाय करें


घर या मकान, जहां हम हमारे प्रियजनों के साथ रहते हैं। सभी का सपना होता है कि उनका अपना सुंदर सा घर हो। इस सपने को पूरा करने के लिए कड़ी मेहनत की जाती है लेकिन फिर भी काफी लोग खुद का आशियाना बनाने में सफल नहीं हो पाते। ज्योतिष के अनुसार यदि कुंडली में मंगल या शनि से संबंधित कोई ग्रह दोष हो तो यह सपना पूरा करने में कई परेशानियों का सामना करना पड़ता है।
ज्योतिष शास्त्र में कई ऐसे उपाय बताए गए हैं जिन्हें अपनाने से ऐसे सभी ग्रह दोषों का प्रभाव कम हो जाता है जिनकी वजह से खुद का घर बनाने में कठिनाइयों को झेलना पड़ता है।

यदि किसी कारणवश आप अपना मकान नहीं बनवा पा रहे हैं या नया मकान नहीं खरीद पा रहे है, तो नीम की लकड़ी का एक छोटा सा घर बनवाकर किसी गरीब बच्चे को दान कर दें या किसी मंदिर में रख आएं। ऐसा करने पर शीघ्र ही आपको घर मिलने के योग बनेंगे। 

Posted By Laxman Swatantra03:52

Wednesday, 17 August 2016

1-हनुमान मंदिर, इलाहबाद, (उत्तर प्रदेश)

अंतर्गत लेख:


एक प्राचीन किंवदन्ती के अनुसार प्रयाग (इलाहबाद) का एक नाम इलाबास भी था। जो मनु की पुत्री इला के नाम पर था। प्रयाग के निकट झूसी या प्रतिष्ठानपुर में चन्द्रवंशी राजाओं की राजधानी थी। इसका पहला राजा इला और बुध का पुत्र पुरुरवा एल हुआ। उसी ने अपनी राजधानी को इलाबास की संज्ञा दी जिसका रूपांतर अकबर के समय में इलाहाबाद हो गया। इलाहबाद में सम्राट अकबर ने 1583 में यमुना तट पर किला बनवाया था। किले के अंदर 232 फुट का अशोक स्तम्भ सुरक्षित है।
 मंदिर लेटे हुए हनुमान जी की प्रतिमा
इलाहबाद में गंगा, यमुना, सरस्वती तीन भव्य नदियों का संगम होता है इसलिए भारत के प्रमुख पवित्र स्थानों में इलाहाबाद प्रमुख है। प्रयाग के नाम से यह स्थान प्रसिद्ध है। इस स्थान पर बारह सालों में एक बार कुंभ का मेला आयोजित होता है। आस्था शिक्षा एवं संस्कृति से ओत-प्रोत इस नगरी में प्रति वर्ष माघ मेले का आयोजन होता है।
जनश्रुति के अनुसार इलाहाबाद में एक अनोखा हनुमान मंदिर है । यह भव्य मंदिर यह मंदिर इलाहाबाद किला के पास गंगा नदी के किनारे पर है। जिसका विवरण पुराणों में विस्तारित रूप में मिलता है। रेलवे स्टेशन के पास शहर के बीचों-बीच स्थित यह मंदिर साल भर खुला रहता है और यहां काफी संख्या में तीर्थयात्री पूजा-अर्चना करने आते हैं। ऐसी मान्यता है कि यहाँ दर्शनकर भक्तों की मनोकामनाएँ पू्र्ण होती हैं। हनुमान की यहां स्थापित अनूठी प्रतिमा को “प्रयाग का कोतवाल” होने का दर्जा भी हासिल है। आम तौर पर जहां दूसरे मंदिरों मे प्रतिमाएँ सीधी खड़ी होती हैं। वही इस मन्दिर मे लेटे हुए बजरंग बली की पूजा होती है।

उत्तर प्रदेश के प्रसिद्ध तीर्थस्थल इलाहाबाद के इस हनुमान मंदिर में हनुमान सोई हुई अवस्था में हैं। यह मंदिर लेटे हुए हनुमान जी की प्रतिमा वाला यद्यपि एक छोटा किन्तु प्राचीन मंदिर है।
इस मंदिर का निर्माण 1787 में किया गया था। सम्पूर्ण भारत का केवल यह एकमात्र मंदिर है, जिसमें हनुमान जी लेटी हुई (सोई हुई अवस्था) मुद्रा में हैं। यहां पर स्थापित हनुमान जी की प्रतिमा 20 फीट लम्बी है। जनश्रुति के अनुसार हनुमान जी के पैर के नीचे देवी कामदा और अहिरावण दबा हुआ है। प्रतिमा जहाँ पर स्थित है वह स्थान सामान्य धरातल से लगभग 8-10 फीट नीचे है। मन्दिर की देखभाल बाघम्बरी गद्दी मठ द्वारा किया जाता है। हनुमान जी के इस स्थान को “बंधवा के बड़े हनुमान जी” भी जाता है।    
जब वर्षा के दिनों में बाढ़ आती है और यह सारा स्थान जलमग्न हो जाता है, तथा हर वर्ष गंगा मैया खुद उन्हें स्नान कराती हैं। कुल मिलाकर ये अनूठा संगम है। तब हनुमानजी की इस मूर्ति को कहीं ओर ले जाकर सुरक्षित रखा जाता है। उपयुक्त समय आने पर इस प्रतिमा को पुन: यहीं लाया जाता है।गुजरते समय के साथ कई बार इस मंदिर का नवीनीकरण किया गया। आखिरी बार 1940 में इस मंदिर में सुधार कार्य किए गए थे।
ऐसी मान्यता है कि संगम का पूरा पुण्य हनुमान जी के इस दर्शन के बाद ही पूरा होता है।
इस मान्यता के पीछे रामभक्त हनुमान के पुनर्जन्म की कथा जुड़ी हुई है।
पौराणिक कथाओं के मुताबिक लंका विजय के बाद भगवान् राम जब संगम स्नान कर भारद्वाज ऋषि से आशीर्वाद लेने प्रयाग आए तो उनके सबसे प्रिया भक्त हनुमान इसी जगह पर शारीरिक कष्ट से पीड़ित होकर मूर्छित हो गए, और अपार कष्ट से पीड़ित होकर मरणा सन्न अवस्था मे पहुँच गए थे। पवन पुत्र को मरणासन्न देख माँ जानकी ने उन्हें अपनी सुहाग के प्रतिक सिन्दूर से नई जिंदगी दी और हमेश स्वस्थ एवं आरोअग्य रहने का आशीर्वाद प्रदान किया, व आशीर्वाद देते हुए कहा कि जो भी इस त्रिवेणी तट पर संगम स्नान पर आयेंगा उस को संगम स्नान का असली फल तभी मिलेगा जब वह हनुमान जी के दर्शन करेगा। माँ जानकी द्वारा सिन्दूर से जीवन देने की वजह से ही बजरंग बली को सिन्दूर चढाये जाने की परम्परा है।
संगम आने वाल हर एक श्रद्धालु यहां सिंदूर चढ़ाने और हनुमान जी के दर्शन को जरुर पहुंचता है। बजरंग बली के लेटे हुए मन्दिर मे पूजा-अर्चना के लिए यूं तो हर रोज़ ही देश के कोने-कोने से हजारों भक्त आते हैं लेकिन मंदिर के महंत आनंद गिरी महाराज के अनुसार राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के साथ साथ पंडित नेहरू, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, सरदार बल्लब भाई पटेल और चन्द्र शेखर आज़ाद जैसे तमाम विभूतियों ने अपने सर को यहां झुकाया, पूजन किया और अपने लिए और अपने देश के लिए मनोकामन मांगी। यह कहा जाता है कि यहां मांगी गई मनोकामना अक्सर पूरी होती है।
 आरोग्य व अन्य कामनाओं के पूरा होने पर हर मंगलवार और शनिवार को यहां मन्नत पूरी होने का झंडा निशान चढ़ने के लिए लोग जुलूस की शक्ल मे गाजे-बाजे के साथ आते हैं। मन्दिर में कदम रखते ही श्रद्धालुओं को अजीब सी सुखद अनुभूति होती है। भक्तों का मानना है कि ऐसे प्रतिमा पूरे विश्व मे कहीं मौजूद नहीं है।
 हनुमान जी की इस प्रतिमा के बारे मे कहा जाता है, कि 1400 इसवी में जब भारत में औरंगजेब का शासन काल था तब उसने इस प्रतिमा को यहां से हटाने का प्रयास किया था। करीब 100 सैनिकों को इस प्रतिमा को यहां स्तिथ किले के पास के मन्दिर से हटाने के काम मे लगा दिया था। कई दिनों तक प्रयास करने के बाद भी प्रतिमा टस से मस न हो सकी। सैनिक गंभीर बिमारी से ग्रस्त हो गये। मज़बूरी में औरंगजेब को प्रतिमा को वहीं छोड़ दिया।
 इलाहबाद किले के पास इसके अलावा अन्य मूर्तियां भी यहां प्रतिष्ठापित है- 
“पातालपुरी मंदिर” की मान्यता है कि किले के भूगर्भ में भगवान राम चित्रकूट-गमन के समय इस स्थान पर आए थे। मनकामेश्वर मंदिर यह मंदिर अन्य शिवालयों में से प्रमुख हैं।
“अलोपीदेवी मंदिर” में प्रत्येक सोमवार एवं शुक्रवार के दिन असंख्य श्रद्धालु आते हैं।नवरात्रि के दिनों में देवी की पूजा-अर्चना होती है। इस प्रसिद्ध भव्य मंदिर में एक शक्तिपीठ में एक कुण्ड एवं ऊपर एक झूला पूजित होता है।नवरात्रि के समय असंख्य श्रद्धालु इस मंदिर में एकत्रित होते हैं।
“हनुमत निकेतन” इस मंदिर में मुख्य मूर्ति हनुमानजी की है, दक्षिण भाग में श्रीराम, लक्ष्मण और जानकी की मूर्तियाँ हैं तथा उत्तर भाग में गुत्रगा की प्रतिमा स्थित है।कल्याणीदेवी मंदिर प्रयाग में स्थित यह मंदिर एक प्रसिद्ध शक्तिपीठ है। मंदिर में तीन मुख्य मूर्तियाँ हैं। कल्याणी देवी के बाएँ तरफ छिन्नमस्ता देवी की मूर्ति है और दाएँ तरफ शंकर-पार्वती की मूर्तियाँ हैं।

Posted By Laxman Swatantra05:23

ज्योतिष के सच

अंतर्गत लेख:


1. कभी भी उच्च के ग्रहों का दान नहीं करना चाहिए और नीच ग्रहों की कभी पूजा नहीं करनी चाहिए।
2 . कुंडली में गुरु दशम भाव में हो या चौथे भाव में हो तो मंदिर निर्माण के लिए धन नहीं देना चाहिए यह अशुभ होता है और जातक को कभी भी फांसी तक पहुंचा सकता है। 
3. कुंडली के सप्तम भाव में गुरु हो तो कभी भी पीले वस्त्र दान नहीं करने चाहिए।
4 . बारहवें भाव में चन्द्र हो तो साधुओं का संग करना बहुत अशुभ होगा। इससे परिवार की वृद्धि रुक सकती है। 5 . सप्तम/अष्टम सूर्य हो तो ताम्बे का दान नहीं देना चाहिए, धन की हानि होने लगेगी।
6. मंत्रोच्चारण के लिए दीक्षा लेनी चाहिए क्योंकि अशुद्ध उच्चारण से लाभ की बजाय हानि अधिक होती है।
7. जब भी मंत्र का जाप करें उसे पूर्ण संख्या में करना जरूरी है।
8. मंत्र एक ही आसन पर, एक ही समय में सम संख्या में करना चाहिए। 
9 . मंत्र जाप पूर्ण होने के बाद दशांश हवन अवश्य करना चाहिए तभी पूर्ण फल मिलता है। 
10. कुछ लोग वार के अनुसार वस्त्र पहनते हैं, यह हर किसी के लिए सही नहीं होता है। कुंडली में जो ग्रह अच्छे हैं उनके वस्त्र पहनना शुभ है लेकिन जो ग्रह शुभ नहीं हैं उनके रंग के वस्त्र पहनना गलत हो सकता है।
11. कई बार किसी से सलाह लिए बिना कुछ लोग मोती पहन लेते हैं, यह गलत है अगरकुंडली में चन्द्रमा नीच का है तो मोती पहनने से व्यक्ति अवसाद में आ सकता है। 
12. अक्सर देखा गया है कि किसी की शादी नहीं हो रही है तो ज्योतिषी बिना कुंडली देखे पुखराज पहनने की सलाह दे देते हैं इसका उल्टा प्रभाव होता है और शादी ही नहीं होती।
13. कुंडली में गुरु नीच का, अशुभ प्रभाव में, अशुभ भाव में हो तो पुखराज कभी भी नहीं पहनना चाहिए।
14. कई लोग घर में मनी प्लांट लगा लेते हैं यह सुनकर कि इससे घर में धन वृद्धि होगी लेकिन तथ्य तो यह है कि अगर बुध खराब हो तो घर में मनी प्लांट लगाने से घर की बहन-बेटी दुखी रहती हैं। 
15. कैक्टस या कांटे वाले पौधे घर में लगाने से शनि प्रबल हो जाता है अतः जिनकी कुंडली में शनि खराब हो उन्हें ऐसे पौधे नहीं लगाने चाहिए। 

Posted By Laxman Swatantra05:18

सर्वप्रथम किसने बांधी राखी किस को और क्यों ??


लक्ष्मी जी ने सर्वप्रथम बलि को बांधी थी। ये बात हैं जब की जब दानबेन्द्र राजा बलि अश्वमेध यज्ञ करा रहें थे तब नारायण ने राजा बलि को छलने के लिये वामन अवतार लिया और तीन पग में सब कुछ ले लिया तब उसे भगवान ने पाताल लोक का राज्य रहने के लिये दें दिया तब उसने प्रभु से कहा की कोई बात नहीँ मैं रहने के लिये तैयार हूँ पर मेरी भी एक शर्त होगी भगवान अपने भक्तो की बात कभी टाल नहीँ सकते उन्होने कहा ऐसे नहीँ प्रभु आप छलिया हो पहले मुझे वचन दें की जो मांगूँगा वो आप दोगे नारायण ने कहा दूँगा दूँगा दूँगा जब त्रिबाचा करा लिया तब बोले बलि
की मैं जब सोने जाऊँ तो जब उठूं तो जिधर भी नजर जाये उधर आपको ही देखूं नारायण ने अपना माथा ठोका और बोले इसने तो मुझे पहरेदार बना दिया हैं ये सबकुछ हार के भी जीत गया है
पर कर भी क्या सकते थे वचन जो दें चुके थे ऐसे होते होते काफी समय बीत गया उधर बैकुंठ में लक्ष्मी जी को चिंता होने लगी नारायण के बिना उधर नारद जी का आना हुआ
लक्ष्मी जी ने कहा नारद जी आप तो तीनों लोकों में घूमते हैं क्या नारायण को कहीँ देखा आपने
तब नारद जी बोले की पाताल लोक में हैं राजा बलि की पहरेदार बने हुये हैं तब लक्ष्मी जी ने कहा मुझे आप ही राह दिखाये की कैसे मिलेंगे तब नारद ने कहा आप राजा बलि को भाई बना लो और रक्षा का वचन लो और पहले तिर्बाचा करा लेना दक्षिणा में जो मांगुगी वो देंगे और दक्षिणा में अपने नारायण को माँग लेना लक्ष्मी जी सुन्दर स्त्री के भेष में रोते हुये पहुँची बलि ने कहा क्यों रो रहीं हैं आप तब लक्ष्मी जी बोली की मेरा कोई भाई नहीँ हैं इसलिए मैं दुखी हूँ तब बलि बोले की तुम मेरी धरम की बहिन बन जाओ तब लक्ष्मी ने तिर्बाचा कराया और बोली मुझे आपका ये पहरेदार चाहिये
जब ये माँगा तो बलि पीटने लगे अपना माथा और सोचा धन्य हो माता पति आये सब कुछ लें गये और ये महारानी ऐसी आयीं की उन्हे भी लें गयीं तब से ये रक्षाबन्धन शुरू हुआ था और इसी लिये जब कलावा बाँधते समय मंत्र बोला जाता हैं 
येन बद्धो राजा बलि दानबेन्द्रो महाबला तेन त्वाम  प्रपद्यये रक्षे माचल माचल:
ये मंत्र हैं
रक्षा बन्धन अर्थात बह बन्धन जो हमें सुरक्षा प्रदान करे सुरक्षा किस से हमारे आंतरिक और बाहरी शत्रुओं से रोग ऋण से।राखी का मान करे। अपनी भाई बहन के प्रति प्रेम और सम्मान की भावना रखे। फैशन ना बनाये।

Posted By Laxman Swatantra04:35

भाई - बहन के पवित्र प्रेम के प्रतीक का उत्सव रक्षाबंधन 18 अगस्त को


श्रावण मास की पूर्णिमा को मनाये जाने वाला रक्षाबंधन का पर्व भाई-बहन के प्रेम का अनुपम उदाहरण है. इस बार यह त्योहार 18 अगस्त, दिन गुरुवार को है. बहनों को इस पर्व का बड़ी ही बेसब्री से इंतजार रहता है. जब बहनें अपने भाइयों की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधती है तो वे यह कामना करती हैं कि उसके भाई के जीवन में कभी कोई कष्ट न हो, वह उन्नति करें और उसका जीवन सुखमय हो. वहीं भाई भी इस रक्षा सूत्र को बंधवाकर गौरवांवित अनुभव करते हैं और जीवन भर अपनी बहन की रक्षा करने की कसम खाते है. भाई बहन मे परस्पर स्नेह व प्यार इस पर्व की गरिमा को और बढ़ा देता है.

इस बार रक्षाबंधन के शुभ मुहूर्त -
🌹 प्रथम मुहूर्त 6.00 a.m. से 07.30 a.m. तक

🌹 द्वितीय मुहूर्त 10.30 a.m. से दोपहर 12.00 p.m. तक

🌹 तृतीय मुहूर्त 12.00 p.m. से 01.30 p.m. तक

🌹 चतुर्थ मुहूर्त 01.30 p.m. से 3.00 p.m. तक

🌹 पंचम मुहूर्त 4.30 p.m. से 6.00 p.m. तक

🌹 षष्टम मुहूर्त 6.00 p.m. से 7.30 p.m. तक.
 🌹  विशेष   🌹
पूजा की थाली में ये 7 चीजें अनिवार्य रूप से होनी चाहिए
इस दिन सभी बहनें अपने भाइयों की कलाई पर राखी बांधने से पहले एक विशेष थाली सजाती है. इस थाली में 7 खास चीजें होनी चाहिए.
  1. कुमकुम
 2. चावल
 3. नारियल
 4. रक्षा सूत्र (राखी)
 5. मिठाई
 7. गंगाजल से भरा कलश
पूजा की थाली में क्यो रखना चाहिए ये खास 7 चीजें -
1. कुमकुम -
तिलक मान-सम्मान का भी प्रतीक है. बहन कुमकुम का तिलक लगाकर भाई के प्रति सम्मान प्रकट करती है तथा भाई की लंबी उम्र की कामना भी करती है. इसलिए थाली में कुमकुम विशेष रूप से रखना चाहिए.
2. चावल -
चावल शुक्र ग्रह से भी संबंधित है. शुक्र ग्रह के प्रभाव से ही जीवन में भौतिक सुख-सुविधाओं की प्राप्ति होती है. तिलक लगाने बाद तिलक के ऊपर चावल भी लगाए जाते हैं. तिलक के ऊपर चावल लगाने का भाव यह है कि भाई के जीवन पर तिलक का शुभ असर हमेशा बना रहे. तथा भाई को समस्त भौतिक सुख-सुविधाएं प्राप्त हों.
3. नारियल -
बहन अपने भाई को तिलक लगाने के बाद हाथ में नारियल देती है. नारियल को श्रीफल भी कहा जाता है. श्री यानी देवी लक्ष्मी का फल. यह सुख - समृद्धि का प्रतीक है. बहन भाई को नारियल देकर यह कामना करती है कि भाई के जीवन में सुख और समृद्धि हमेशा बनी रहे और वह लगातार उन्नति करता रहे. यह नारियल भाई को वर्षपर्यंत अपने घर मे रखना चाहिए.
4. रक्षा सूत्र (राखी) -
बहन राखी बांधकर अपने भाई से उम्र भर रक्षा करने का वचन लेती हैं. भाई को भी ये रक्षा सूत्र इस बात का अहसास करवाता रहता है कि उसे हमेशा बहन की रक्षा करनी है. रक्षा सूत्र का अर्थ है, वह सूत्र (धागा) जो हमारे शरीर की रक्षा करता है. रक्षा सूत्र बांधने से त्रिदोष शांत होते हैं. त्रिदोष यानी वात, पित्त और कफ. हमारे शरीर में कोई भी बीमारी इन दोषों से ही संबंधित होती है. रक्षा सूत्र कलाई पर बांधने से शरीर में इन तीनों का संतुलन बना रहता है. ये धागा बांधने से कलाई की नसों पर दबाव बनता है, जिससे ये तीनों दोष निंयत्रित रहते हैं.
5. मिठाई -
राखी बांधने के बाद बहन अपने भाई को मिठाई खिलाकर उसका मुंह मीठा करती है.  मिठाई खिलाना इस बात का प्रतीक है कि बहन और भाई के रिश्ते में कभी कड़वाहट न आए, मिठाई की तरह यह मिठास हमेशा बनी रहे.
6. दीपक -
राखी बांधने के बाद बहन दीपक जलाकर भाई की आरती भी उतारती है. इस संबंध में मान्यता है कि आरती उतारने से सभी प्रकार की बुरी नजरों से भाई की रक्षा हो जाती है. आरती उतारकर बहन कामना करती है कि भाई हमेशा स्वस्थ और सुखी रहे.
7. गंगाजल से भरा कलश -
राखी की थाली में गंगा!जल से भरा हुआ एक कलश भी रखा जाता है. इसी जल को कुमकुम में मिलाकर तिलक लगाया जाता है. हर शुभ काम की शुरुआत में जल से भरा कलश रखा जाता है. ऐसी मान्यता है कि इसी कलश में सभी पवित्र तीर्थों और देवी-देवताओं का वास होता है. इस कलश की प्रभाव से भाई और बहन के जीवन में सुख और स्नेह सदैव बना रहता है.
रक्षाबंधन के अवसर पर वैदिक राखी बाँधें
इस राखी को बनाने मे 5 वस्तुओं की आवश्यकता होती है ।
1. दूब (घास)
2. अक्षत (चावल)
3. केसर
4. चन्दन
5. पीली सरसों के दाने
इन पाँचों वस्तुओं को रेशम के कपडे में बाँध दें या सिलाई कर दें . फिर उसे कलावा में पिरो दें , इस प्रकार आपकी वैदिक राखी तैयार होती है .
वैदिक राखी में प्रयुक्त चीजो का महत्व -
1. दूब
2. अक्षत
3. केसर
4.  चंदन
5. पीली सरसों के दाने
1. दूब -
🌹🌹🌹

राखी मे दूब की अवधारणा यह है कि जिस प्रकार दूब का अंकुर बो देने पर तेजी से फैलता है और हजारों की संख्या में उग जाता है. उसी प्रकार भाई का वंश और उसके सद्गगुणों का विकास हो. सदाचार मन की पवित्रता तेजी से बढती जाये.

2. अक्षत -
राखी मे अक्षत की अवधारणा यह है कि हमारी भाई के प्रति श्रद्धा कभी क्षत - विक्षत न हो. सदैव बनी रहे.
3. केसर -
राखी मे केसर की अवधारणा यह है कि  जिस प्रकार केसर की प्रकृति तेज होती है उसी प्रकार हमारा भाई भी तेजस्वी हो. उसके जीवन में आध्यात्मिकता एवं भक्ति का तेज कभी भी कम न हो.
4.  चंदन -
राखी मे चंदन की अवधारणा यह है कि चंदन सुगंध और शीतलता देता है उसी प्रकार भाई के जीवन में कभी मानसिक तनाव न हो. उसका जीवन सुगंध और शीतलता से ओतप्रोत हो.
5. पीली सरसों के दाने -
राखी मे पीली सरसों के दाने की अवधारणा यह है कि जिस प्रकार सरसों की प्रकृति तीक्ष्ण होती है उसी प्रकार उसका भाई समाज के दुर्गुणों एवं बुराइयों को समाप्त करने में तीक्ष्ण बने.
वैदिक राखी बाँधने की विधि -
पांच वस्तुओं से बनी हुई एक राखी को सर्वप्रथम अपने ईष्ट के चित्र पर अर्पित करनी चाहिए. फिर बहनें अपने भाई को, माता अपने बच्चों को, दादी अपने पोते को शुभ संकल्प करके बांधे.
 राखी बांधते समय यह श्लोक बोलें –
''येन बद्धो बलिःराजा दानवेन्द्रो महाबलः ।
तेन त्वामनुबध्नामि रक्षे मा चल मा चलः ||

Posted By Laxman Swatantra04:29

Sunday, 17 July 2016

नक्षत्रानुसार जातक पर पड़ने फल

अंतर्गत लेख:


जातक पर नक्षत्र का बहुत प्रभाव पड़ता है | अतः नक्षत्रानुसार जातक पर पड़ने वाला प्रभाव आगे दिया गया है |

1-अश्विनी – विचारशील, अध्ययन, अध्यापन करने वाला, ज्योतिष, वैद्यक आदि शास्त्रों में रूचि रखने वाला, लेखक, ईमानदार, चंचल प्रकृति, मस्से का रोगी और गृह – कलह प्रिय |
2-भरणी – बलवान, शत्रुओं पर अचानक आक्रमण करने वाला, चालाक, धार्मिक कार्यो में रूचि रखने वाला, चित्रकार, धोखेबाज, निम्न स्तर के कार्य करने वाला तथा उन्नति का आकांक्षी |
3-कृत्तिका – विध्याभिलाषी, पशु प्रेमी, अस्वस्थ्य, भोगी, साधक, साधू संतों में आस्था रखने वाला, कलहप्रिय,निर्धन से धनवान होने वाला, लड़ाई-झगड़ों में रूचि रखने वाला, वकील एवं कट्टर धार्मिक |
4-रोहिणी – स्वच्छता प्रिय, असत्यवादी, संगीत में रूचि रखने वाला, सामजिक कार्यकर्त्ता, प्रसन्नचित्त, भूत-प्रेतों में विश्वास करने वाला, प्रतिष्ठा का इच्छुक, ईमानदार व् सत्यभाषियों का हित सम्पादन करने वाला |
5-मृगशिरा – धनवान, अनैतिक कार्यों से धन इकठ्ठा करने वाला, अविश्वासी, उन्नतिगामी, सट्टा-जुआ आदि में रूचि रखने वाला, व्यापारी, अधिकारी, कार्यों में निपुण, विचारशील, प्रगतिशील, धार्मिक और यदा कदा उत्सवों में झूठा आडम्बर तथा शान-शौकत दिखाने वाला |
7-आर्द्रा – मधुरभाषी, सबसे प्रेमपूर्वक व्यवहार करने वाला, साधारण आर्थिक स्थिति युक्त,अपमानजनक कार्य करने वाला, अदूरदर्शी, कुटुम्बियों से कलह करने वाला, ओछा तथा घुमक्कड़ी |
8-पुनर्वसु – विचारपूर्वक कार्य करने वाला, शिक्षक तथा मेधावी, दंतरोग से पीड़ित, ससुराल से धन प्राप्त करने वाला, वृद्धावस्था में सुखी, स्वच्छ वस्त्रों का इच्छुक, क्रोधी, अभिमानी, उच्चाभिलाषी, उत्तम तथा महत्वपूर्ण पद प्राप्त करने वाला, व्यभिचारी तथा आलसी और हाथ पैरों की पीड़ा से ग्रस्त |
9-पुष्य – अस्वस्थ्य, कार्यों को चतुरतापूर्वक निबटाने वाला, शिव भक्त, मशीनरी, की वस्तुओं से लाभ पाने वाला, बात बेबात मित्रों से विरोध करने वाला, व्यापारिक बुद्धि वाला, सम्बन्धियों से प्रेम करने वाला, मानसिक चिंता से ग्रस्त, साधारण आर्थिक स्थिति वाला तथा मुंह पर स्पष्ट कहने वाला |
10-आश्लेषा – धनवान, स्त्री प्रेमी, काम-शक्ति में कमजोर, स्वार्थी, दूसरों का कार्य करने में तत्पर, खाने पीने में रूचि रखने वाला, अकस्मात् आहत करने वाला,  कभी कभी चोरी करने वाला, आलसी, छोटे व्यक्ति से मित्रता करने वाला, स्त्री के कष्ट से पीड़ित, हंसमुख और सत्यवक्ता |
11-मघा – गुप्त कार्यों में रूचि रखने वाला, क्रोधी, अकस्मात् हानि उठाने वाला, कर्णरोगी, तेज आवाज वाला, प्रबल कामी, दूसोर्ण के धन पर अधिकार रखने वाला, उन्नति में बार बार बाधाओं का सामना करने वाला, अप्रसन्नचित, चर्म रोग से पीड़ित, चिंताग्रस्त और अल्प वेतनभोगी |
12-पूर्वाफाल्गुनी – शस्त्र चलाने में निपुण, पशु-प्रेमी, व्यापारिक कार्यों में रूचि रखने वाला, धार्मिक संस्थाओं में कार्य करने वाला, क्रय विक्रय में हानि उठाने वाला, उन्नति के कार्यों में असफल, मान-सम्मान की इच्छा रखने वाला, इन्द्रिय सम्बन्धी रोगों से ग्रसित, स्वधर्म में अश्रद्धायुक्त, सर पर चोट का निशान रखने वाला, परेशान और हिम्मतवाला |
13-उत्तराफाल्गुनी – प्रियभाषी, कार्य-कुशल, अल्प द्रव्य वाला, थोड़े में निर्वाह करने वाला, एकांतप्रेमी, पशुओं में श्रद्धा रखने वाला, मातृ पितृ सुख से वंचित, तीक्ष्ण स्मरण शक्ति वाला, कलाकुशल और सम्बन्धियों से प्रेम व्यवहार करने वाला |
14-हस्त – मक्कार, कपटप्रिय, असत्यभाषी, अभिमानी, परिश्रमी, माता पिता के कष्ट से पीड़ित, लापरवाह, गायन प्रेमी, लम्बे डील डोल वाला, परिश्रम से उन्नति करने वाला, जलप्रेमी तथा पशु आदि पालकर निर्वाह करने वाला |
15-चित्रा – कर्ण तथा नेत्ररोगी, अद्भुत कार्य करने वाला, साधारण सी बात पर क्रोध करने वाला, नायक के कार्य में निपुण, शारीरिक बल बढाने में प्रयत्नशील, गरीब, विद्याभ्यास का इच्छुक, अनुभवी, शत्रुओं का सामना करने वाला तथा ईमानदार |
16-स्वाति – वीर, नेता, स्वप्नों में जीवित रहने वाला, भाग्यशाली, क्रोधावेश में खुद की और घर की हानि करने वाला, स्वतन्त्र विचार वाला, उन्नति में बाधा का शिकार, अपनी बात पर हठपूर्वक अड़ने वाला, चतुराई से काम निकालने वाला, पुष्ट शरीर, तीव्र विचार शक्ति और शरीर में चोट पाने वाला |
17-विशाखा – विदेशी भ्रमणकारी, चित्रकार, सच्चाई का इच्छुक, लड़ाई करने में कुशल, विचारहीन, चतुर, व्यापारिक कार्यों में रूचि रखने वाला, दूसरों को अच्छी सलाह देने वाला, भाषण देने में चतुर, उन्नतिशील तथा ज्योतिष आदि में विश्वास रखने वाला |
18-अनुराधा – उच्च विचार वाला, ईमानदारी से कार्य करने वाला, स्वधर्म प्रेमी, नए विचारों का स्वागत करने वाले, दर्शन, वेद और ज्योतिष में तीव्र रुचि रखने वाला, सम्मान पाने वाला, पितृ सुख से वंचित, काम निकालने में चतुर, कला निपुण, पढने में परिश्रमी, बचपन से दुःख उठाने वाला, उन्नतिशील, दूसरों की बातों को समझने वाला और उनको समझाने वाला, उच्च कोटि का कार्यकर्ता तथा संगीत में रूचि रखने वाला |
19-ज्येष्ठा – अच्छा लेखक, अभिमानी, विलासी, भाइयों से हानि उठानी वाला, बोलने में तेज, अस्वस्थ्य, आलसी स्वभाव, पशु पालन, मित्रों पर अंध श्रद्धा रखने वाला, उन्नति के कार्य में विघ्न बाधा पाने वाला, स्वकुल विरोधी तथा उन्नतिशील |
20-मूल – अपनी इच्छानुसार कार्य करने वाला, पुरानी पीढ़ी से विद्रोह करने वाला, पिता को  कष्टकारी, उदररोगी, दूसरों की बात न मानने वाला, घुमक्कड़ जीवन बिताने वाला, जादू टोने और तांत्रिक विद्या में निपुण, औषधियों के क्रय विक्रय से लाभ उठाने वाला, वस्त्रालंकार प्रेमी, शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने वाला, पढने की तीव्र इच्छा रखने वाला, स्वच्छता प्रेमी, बुढापे में कष्ट उठाने वाला एवं पढ़ाई में उन्नति करने वाला |
21-पूर्वाषाढ़ – दूसरों से सम्मान प्राप्त करने वाला, बचपन में दुखी परन्तु मध्यमावस्था में सुखी, शान्तिभोगी, प्रबल कामी, अनेक स्त्रियों से संसर्ग रखने वाला, एकान्तप्रिय, दुर्बल शरीर, गायन कला में निपुण, स्त्रियों से धन प्राप्त करने वाला, अल्पायु में पिता कष्ट से पीड़ित, मानसिक रोगी, अनेक चिंताओं से ग्रसित, कार्यकुशल तथा शीघ्र सफलता प्राप्त करने वाला |
22-उत्तराषाढ़ – चित्रकला में निपुण, स्वच्छ वस्त्रों का शौक़ीन, मान-प्रतिष्ठा प्राप्त करने वाला, भाषण कला में निपुण, पुष्ट शरीर, श्रेष्ठ बुद्धि, अल्पायु, अभिमानी, असत्यभाषी, रुक रुक कर बात करने वाला, व्यापारिक कार्यों से लाभ उठाने वाला, गृहकार्यों में निपुण, तीव्र बुद्धि वाला, इच्छाशक्ति और भविष्य के लिए सुख सुविधा जुटाने वाला |
23-श्रवण – चंचल स्वभाव, मातृ-पितृ भक्त, अभिमानी, जल सम्बन्धी कार्यों में रूचि रखने वाला, सोच विचार कर कार्य करने वाला, मित्र विरोधी, खाने पीने की वस्तुओं का शौक रखने वाला, अस्वस्थ्य, व्यापार एवं क्रय विक्रय से लाभ उठाने वाला, भूमि कार्यों में निपुण, धनवान व् धार्मिक कार्यों में उत्साह रखने वाला |
24-धनिष्ठा – अदूरदर्शी, उन्नति के कार्यों में बाधा पाने वाला, युद्ध कार्यों से प्रेम करने वाला, गरीब, श्रम से ऊंचा उठने वाला,  स्त्री प्रेमी, ईमानदार, स्वच्छ वस्त्रधारी, क्रोधी, अभिमानी, उन्नति की आकांक्षा रखने वाला, लोहे के कार्य में हानि उठाने वाला तथा मार-पीट में नुक्सान उठाने वाला |
25-शतभिषा – सेवाभावी, स्वच्छ, पवित्र कार्य करने वाला, धार्मिक, चंचल स्वभाव, बिना सोच समझकर कार्य करने वाला, यदा कदा किये गए कार्यों में हानि उठाने वाला, मशीनरी के कार्यों में रूचि रखने वाला, उच्च विचार एवं सात्विक जीवन बिताने वाला, बुद्धिमान, सदाचारी, साधु संतो का प्रेमी तथा कट्टर धार्मिक |
26-पूर्वाभाद्रपद – ईश्वरभक्त, स्त्रियों से संकोच करने वाला, आरामपसंद, पुजारी, कार्य में अनायास सफलता प्राप्त करने वाला, यात्रा प्रिय, कवि, चतुरतापूर्वक कार्य करने वाला, स्वस्थ्य, बच्चो का प्रेमी और शिक्षण कार्यों में रूचि रखने वाला |
27-उत्तराभाद्रपद – प्रसन्नचित्त, उन्नतिशील, स्त्रियों से विशेष सम्मान पाने वाला, उदारचरित्र, मुक्तहस्त, भावुक, सोच-विचार से काम करने वाला, अकस्मात् हानि का शिकार, शत्रुओं से दुखी, आलसी, विद्या प्रेमी, उच्च सत्कुलीन, राजकर्मियों का मित्र |
28-रेवती – विद्याप्रेमी, सरल स्वभाव, विनम्र, तीर्थयात्री, बुद्धि से काम न करने वाला, प्रसन्नचित्त, गरीब, एकान्तप्रिय, ईश्वरभक्त, उन्नति के कार्यों में रुकावट पाने वाला, आध्यात्मिक शक्ति से संपन्न, सोच विचार न करने वाला और मित्रों से लाभ उठाने वाला |

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Monday, 27 June 2016

हनुमान जी के मंगलवार का व्रत करने के नियम

                         हनुमान जी के मंगलवार का व्रत  मंगलवार व्रत करने के नियम

सभी हनुमान भक्त मंगलवार और शनिवार का व्रत भगवान हनुमान को समर्प्रित करके कर सकते है | यदि जोतिष शास्त्र को देखे तो मंगलवार का व्रत उन्हें करना चाहिए जिनकी कुंडली में मंगल गृह निर्बल हो और इसी कारण शुभ फल देने में असमर्थ हो | इस व्रत से उनकी कुंडली का मंगल ग्रह सुदरकर शुभ फल देने वाला हो जाता है | मंगलवार व्रत  मंगलवार व्रत से लाभ : मंगल व्रत से हनुमान जी की अशीम कृपा प्राप्त होती है | यह व्रत सम्मान , बल , साहस और पुरुषार्थ को बढाता है | संतान प्राप्ति के लिए भी है व्रत बहूत फलदायक है | इस व्रत से पापो से मुक्ति प्राप्त होती है | भुत प्रेत काली शक्तियों का दुष्प्रभाव इस व्रतकर्ता पर नहीं पड़ता है और भी बहूत सारे फायदे है मंगलवार व्रत से
मंगलवार व्रत विधि
यह व्रत लगातार 21 मंगलवार तक किया जाना चाहिए | व्रत वाले दिन सूर्योदय से पूर्व नित्य कर्म से निपूर्ण होकर नहा ले | उसके बाद घर की ईशान कोण की दिशा में किसी एकांत स्थान पर हनुमानजी की मूर्ति या चित्र स्थापित कर दे | लाल वस्त्र इस दिन पहने और व्रत का संकल्प हाथ में पानी ले कर करे | पूजन स्थान पर घी का दीपक जलाये और हनुमानजी की मूर्ति या चित्र पर पुष्प माला चढ़ाकर चमेली के तेल के हलके छीटे दे | मंगलवार व्रत कथा पढ़े फिर उसके बाद हनुमान चालीसा का पाठ करे | सभी को व्रत का प्रसाद बांटकर स्वयं प्रसाद ग्रहण किया जाता है. पुरे दिन सिर्फ एक बार भोजन ले | अपने आचार विचार पुरे दिन शुद्ध रखे और रात्रि में सोने से पहले फिर एक बार हनुमानजी की पूजा करे |
मंगलवार व्रत उद्ध्यापन :
21 मंगलवार के व्रत होने के बाद अगले मंगलवार पर 21 ब्राह्मणों को बुलाकर उन्हें भोजन कराये और यथाशक्ति दान –दक्षिणा दे |

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राजस्थान के मेंहदीपुर वाले बालाजी

राजस्थान के मेंहदीपुर वाले बालाजी

राजस्थान के सवाई माधोपुर और जयपुर की सीमा रेखा पर दौसा जिले में स्थित मेंहदीपुर कस्बे में बालाजी का एक अतिप्रसिद्ध तथा प्रख्यात मन्दिर है जिसे श्री मेंहदीपुर बालाजी मन्दिर के नाम से जाना जाता है । नास्तिक भी बालाजी के साक्षसात चमत्कार देखकर आस्तिक बन जाते है | भूत प्रेतादि ऊपरी बाधाओं के निवारणार्थ यहां आने वालों का जमघट लगा रहता है। तंत्र मंत्रादि ऊपरी शक्तियों से ग्रसित व्यक्ति बालाजी के आशिर्वाद से पूरी तरह रोग मुक्त होकर निकलते है । सम्पूर्ण भारत से और देश विदेश से भक्तो का यहा ताँता लगा रह्ता है |
मंदिर निर्माण :
यह मंदिर ऐसी जगह बना हुआ है जहा प्राचीन काल में बहूत हिन्सक जंगल हुआ करता था | समय के साथ अब यह एक छोटा क़स्बा बन चूका है | दो पहाडियो के बीच बालाजी का मंदिर बना हुआ है , जिसे घाटे वाले बालाजी के नाम से भी पुकारा जाता है | इस मंदिर में हनुमान जी बल रूप में विराजमान है जो अपने आप पहाड़ी के पत्थर से बने हुए है | इस मूरत की तर्ज पर बाकी मंदिर का निर्माण किया गया है |
चमत्कारिक पानी की धारा :
ध्यान से देखने पर हनुमान जी के सीने में एक छोटा सा छेद है जिसमे से निरंतर पानी की एक धारा बहती रहती है यह जल बालाजी के चरणों तले स्थित एक कुण्ड में एकत्रित होता रहता है, जिसे भक्त्जन चरणामृत के रूप में अपने साथ ले जाते हैं |
तीन शक्तिया एक साथ भूत प्रेत खाते है मुक्के और लात :
घाटे वाले बालाजी के अलावा यहा प्रेतराज सरकार और भैरवनाथ (कौतवाल) भक्तो की पीड़ा हरते है | दुखी कष्टग्रस्त व्यक्ति को मंदिर पहुंचकर तीनों देवगणों को प्रसाद चढाना पड़ता है । बालाजी को लड्डू प्रेतराज सरकार को चावल और कोतवाल कप्तान (भैरव) को उड़द का प्रसाद चढाया जाता है । इस प्रसाद में से दो लड्डू रोगी को खिलाए जाते हैं और शेष प्रसाद पशु पक्षियों को डाल दिया जाता है ।
मंदिर निर्माण का प्राचीन इतिहास :
श्री गणेश पूरी जी महाराज घाटे वाले बालाजी मंदिर के ११वे महंत के अनुसार उनके पुर्वज को एक रात्री सपने में हनुमानजी ने आदेश दिए की यहा तीन शक्तियो का मंदिर बनना चाहिए जो अपने भक्तो के संकतो को दूर करेंगे | अपनी साधना से हनुमान जी ने उन पुर्वज को वह जगह पहाड के बीच में बताई | इस तरह इस मंदिर का निर्माण हुआ |

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मेंहदीपुर श्री बालाजी की भोग विधि

श्री बालाजी की भोग विधि
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जब भी रोगी घर से दरबार आए तब सवा दो रुपए, एक नारियल, सवा मीटर कपडा, मकान की मिट्टी तथा पीले चावल बालाजी महाराज का ध्यान रखकर मकान में घुमाकर लाएँ प्रार्थना करे कि-"हमारे मकान मे घर एव बाहर संबंधी जो भी संकट हो बालाजी महाराज का ध्यान रखकर मकान में घुमाकर लाएँ और प्रार्थना करे कि---" हमारे मकान मे घर एवं बाहर संबंधी जो भी संकट हो बालाजी महाराज इस नारियल के द्वारा दरबार ले जाएँ |
2. बालाजी दरबार मे आने के बाद रोगी स्नान इत्यादि करके आने की दरखास्त एवं इस विधान को बालाजी दरबार मे भेट करे और प्रार्थना करे कि--"बालाजी महाराज ! जो भी संकट आए है उनको दरबार मे रखे और मुझे शान्ति दे |"
 3.दरखास्त बालाजी के दरबार में :
एक दरखास्त रोगी के नाम लगा दे | दरखास्त तीनो जगह बालाजी,भैरव जी था प्रेतराज सरकार के समक्ष लगेगी | बालाजी से दो लड्डू वापिस मिलेगे उन्हे अलग हाथो मे रख ले और जब तीनो जगह दरखास्त लग जाए तब बचा हुआ श्री प्रेतराज सरकार के दरबार के पीछे पहाडियो पर पक्षियो को लड्डूओ को रोगी को खिला दे |
4.अर्जी:--
इसके बाद रोगी के नाम से अर्जी लगानी चाहिए | अर्जी का समय आरती के बाद ७ बजे से ११ बजे तक है | अर्जी १८१ रुपये मे मंदिर के बाहर दुकानो से मिलेगी | अर्जी मे लड्डू और उबले हुए चावल व उडद मिलते है | बालाजी के दरबार से अर्जी के दो लड्डू मिलेगे | तीनो जगह बालाजी, भैरव जी, प्रेतराज जी को भोग लगा दे तथा शेष अर्जी का सामान प्रेतराज जी के दरबार के पीछे पहाडियो पर डालने के बाद लड्डू रोगी को खिला दे |एक अर्जी लगाने वाले की तीन वर्ष तक रक्षा करती है | तीन वर्ष बाद यदि आवश्यकता हो तो दरबार मे आकर अर्जी लगानी चाहिए | अर्जी के साथ एक दरखास्त लगानी जरुरी है जिससे अर्जी स्वीकार हो जाती है | यह दरखास्त हर प्रश्न पर लगा सकते है | चाहे भूत-बाधा हो या परिवार पर संकट या अन्य प्रकार की समस्या | एक दरखास्त दो प्रश्न के लिए ही लगेगी |
 ५. पेशी लेने के लिए :
पेशी के छोटे लड्डू २.२५ पैसे मे दुकानदारो से लेकर आरती से पहले मंदिर मे जमा करा दे | आरती के बाद वे ही लड्डू मंदिर मे बटते है | वे लड्डू लेकर रोगी को खिला दे तुरन्त जो भी संकट आदि है वह बोलने लगेगा |
 ६. भैरव बाबा का भोग:
यदि पेशी न आए और संकट न बोले तो भैरव बाबा का भोग लगाना जरुरी है | भैरव जी के भोग मे १०० ग्राम गुलगुले होते है भोग लने के बाद २ गुलगुले रोगी को खिलादे | बाकी गुलगुले रोगी पर से २१ बार उतार कर कुत्ते को खिलादे |
 ७.प्रेतराज जी का भोग :
इसके पश्चात प्रेतराज जी का भोग लगाना अनिवार्य है | प्रेतराज जी का भोग १०० ग्रम खीर से लगाएँ | भोग की बची हुई खीर व अन्य लोग भी ले सकते है |

८. दीवान सरकार का भोग :
इसके पश्चात दिवान सरकार का भोग लगाना चाहिए |उनका दरबार श्री प्रेतराज सरकार जी के पीछे है | भोग मे सात बताशे ,थोडी मिठाई, दो लोग, दो इलायची जलते हुए कण्डे पर रखो और रोगी को उसका धुआँ साँस के साथ अन्दर लेने दे | रोगी के अन्य घरवाले दीवान सरकार के सामने दो अगर्बत्ती जलाकर प्रार्थना करे कि पेशी आ जाए और संकट कट जाए |
 ९.माँ काली का भोग :
अब यदि भूत - बाधा न बोले, न हटे, न कटे और रोगी पर चौकी या बंधन हो तो माँ काली का भोग लगाना चाहिए जिनका मंदिर सामने पहाडी पर है | माँ काली के भोग मे एक पान , एक दरखास्त एक लोटा जल, एक जायफल दो बताशे, दो लौग लेकर माँ काली का भोग पुजारी जी से लगवा दे | भोग लगाने के बाद पुजारी जी थोडा -सा जल , थोडा सा पान और लड्डू देगे, वह रोगी को खिला दे और माँ काली से संकट काटने की विनती करे |
 १०. समाधी वाले बाबा का भोग :
यह भोग प्रातः ७ बजे व १२ बजे, सायं ५ से ६ बजे, समाधी पर लगेगा | इसमे १०० ग्राम जलेबी लेकर भोग लगवाएँ | दो जलेबी रोगी को खिलाएँ और बाकी कुत्ते को खिला दें |
११.भंगी बाडे का भोग :
यदि पेशी नही आती तो भंगी बाडे का भोग लगवाना जरुरी है | वह स्थान श्री प्रेतराज जी के दरबार मे जाते हुए सीढियो के पास उल्टे हाथ की तरफ है | इस भोग मे सात बताशे , थोडी मिठाई , दो लौग, दो इलायची, जलते हुए कण्डे पर रखकर रोगी को धुआ लेना चाहिए | भंगी बाडे का भोग लगाने के बाद रोगी और उनके साथ के लोग किसी अन्य यात्री को न छुएँ बल्कि ठरने के स्थान पर नहाकर कपडे बदलकर दरबार मे जाएँ |
१२.पीपाल के वृक्ष पर :
एक लोटा जल , दो बताशे, दो इलायची पीपल के वृक्ष पर चढा दे और प्रार्थना करे कि जो भी बंधन , चौकी इत्यादि हो वह कट जाए | लोटे मे थोडा जल बचा ले और रोगी को पिला दे |साथ ही इन मन्त्रो का जाप करे :-- ॐ तंत्र मंत्र क्रिया बटुक भैरवाय नमः, ॐ क्लीं कलिकाय नमः, ॐ भैरवाय नमः , ॐ प्रेतराजाय धर्मराजाय नमः, ॐ ह्री हनुमते नमः ,रामाय नमः , ॐ दुर्गाय नमः , ॐ बटुक भैरवाय नमः |
13.जाप करने की विधि :
कुश अथवा ऊन के आसन पर बैठकर सामने दीप जलाकर रखे तथा श्री बालाजी, माँ दुगाँ , माँ काली तथा भगवान शंकर जी के चित्रो को भी सामने रख ले | एक पात्र मे जल ले तथा एक खाली पात्र पास मे रख ले |१०८ मनको की एक माला पूरी हो जाने पर थोडा जल शुध्द पात्र मे गिराए | इस प्रकार हर मंत्र की सात मालाएँ पूरी करने पर सातबार खाली पात्र मे जल गिराए और सात माला हो जाने पर यह जल रोगी को पीला दिया जाए तथा विश्वास और श्रध्दापूर्वक बालाजी के दरबार मे हनुमान चालीसा अथवा दुर्गा चालीसा का पाठ करे | इतने पर भी पेशी या संकट नही बोलता है तो रोगी को गीता का सातवाँ, आठवाँ तथा बारहवाँ अध्याय सुनाना अनिवार्य है |
१४. परीक्षण :
संकट कटने के बाद पेशी के लड्डू रोगी को एक बार खिलाना जरुरी है | इससे संकट का निवारण हो जाता है | कि और कोई भूत आदि तो नही है | भूतो की बातो पर कभी विश्वास नही करना चाहिए क्योकि वे हमेशा झूठ बोलते है और बचने की कोशिश करते है |

१५. हवन :
११, २१, ४१ दिन के नियम पूर्ण होने पर किसी कर्मकाडी ब्राह्मण से हवन कराना चाहिए | हवन समाप्त हो जाने पर रोगी कही भी जा सकता है |

१६. परहेज :

संकट कटने के बाद ११, २१, या ४१ दिनो तक नियम परहेज से रहना चाहिए तथा तेल ,साबुन , सरसो, काली मिर्च, लौग श्री बालाजी के दरबार मे पढवाने के बाद ही रोगी को प्रयोग करनी चाहिएँ | रोगी को जमीन पर सोना चाहिएँ | सरसो का तेल अथवा देसी घी कि अखंड ज्योति जलानी चाहिए | सुबह -शाम बालाजी की पूजा करे | तेल ,खटाई , मिर्च का रोगी को सेवन नही करना चाहिए | हल्का घी, दुध तथा हरी सब्जी रोगी ले सकता है | परंतु ये सभी चीजे बाबा की भभूती जो श्री बालाजी , श्री भैरव जी श्री प्रेतराज जी के दरबार मे मिलती है मिलकर ही लेनी चाहिए || ११, २१, ४१ दिनो तक रोगी को घर से बाहर नही निकालना चाहिए |

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मेंहदीपुर बालाजी भगवान के मंदिर के नियम ,

                मेंहदीपुर बालाजी भगवान के मंदिर के नियम आपको अवश्य जानना चाहिए

राजस्थान के सवाई माधोपुर और जयपुर की  सीमा रेखा पर स्थित मेंहदीपुर कस्बे में बालाजी का एक अतिप्रसिद्ध तथा प्रख्यात मन्दिर है जिसे श्री मेंहदीपुर बालाजी मन्दिर के नाम से जाना जाता है । भूत प्रेतादि ऊपरी बाधाओं के निवारणार्थ यहां आने वालों का तांता लगा रहता है। तंत्र मंत्रादि ऊपरी शक्तियों से ग्रसित व्यक्ति भी यहां पर बिना दवा और तंत्र मंत्र के स्वस्थ होकर लौटते हैं । सम्पूर्ण भारत से आने वाले  लगभग एक हजार रोगी और उनके  स्वजन यहां नित्य ही डेरा डाले रहते हैं । बालाजी का मन्दिर मेंहदीपुर नामक स्थान पर दो पहाड़ियों के बीच स्थित है, इसलिए इन्हें घाटे वाले बाबा जी भी कहा जाता है । इस मन्दिर में स्थित बजरंग बली की बालरूप मूर्ति किसी कलाकार ने नहीं बनाई, बल्कि यह स्वयंभू है । यह मूर्ति पहाड़ के अखण्ड भाग के रूप में मन्दिर की पिछली दीवार का कार्य भी करती है । इस मूर्ति को प्रधान मानते हुए बाकी मन्दिर का निर्माण कराया गया है । इस मूर्ति के सीने के बाईं तरफ़ एक अत्यन्त सूक्ष्म छिद्र है, जिससे पवित्र जल की धारा निरंतर बह रही है । यह जल बालाजी के चरणों तले स्थित एक कुण्ड में एकत्रित होता रहता है, जिसे भक्त्जन चरणामृत के रूप में अपने साथ ले जाते हैं । यह मूर्ति लगभग 1000 वर्ष प्राचीन है किन्तु  मन्दिर का निर्माण इसी सदी में कराया गया है । मुस्लिम शासनकाल में कुछ बादशाहों ने इस मूर्ति को नष्ट करने की कुचेष्टा की, लेकिन वे असफ़ल रहे । वे इसे जितना खुदवाते गए मूर्ति की जड़ उतनी ही गहरी होती चली गई । थक हार कर उन्हें अपना यह कुप्रयास छोड़ना पड़ा । ब्रिटिश शासन के दौरान सन 1910  में बालाजी ने अपना सैकड़ों वर्ष  पुराना चोला स्वतः  ही त्याग दिया । भक्तजन इस चोले को लेकर समीपवर्ती मंडावर रेलवे स्टेशन पहुंचे, जहां से उन्हें चोले को गंगा में प्रवाहित करने जाना था । ब्रिटिश स्टेशन मास्टर ने चोले को निःशुल्क ले जाने से रोका और उसका लगेज करने लगा, लेकिन चमत्कारी चोला कभी मन भर ज्यादा हो जाता और कभी दो मन कम हो जाता । असमंजस में पड़े स्टेशन मास्टर को अंततः चोले को बिना लगेज ही जाने देना पड़ा और उसने भी बालाजी के चमत्कार को नमस्कार किया । इसके बाद बालाजी को नया चोला चढाया गया । यज्ञ हवन और ब्राह्मण भोज एवं धर्म ग्रन्थों का पाठ किया गया । एक बार फ़िर से नए चोले से एक नई ज्योति दीप्यमान हुई । यह ज्योति सारे विश्व का अंधकार दूर करने में सक्षम है । बालाजी महाराज के अलावा यहां श्री प्रेतराज सरकार और श्री कोतवाल कप्तान ( भैरव ) की मूर्तियां भी हैं । प्रेतराज सरकार जहां द्ण्डाधिकारी के पद पर आसीन हैं वहीं भैरव जी कोतवाल के पद पर । यहां आने पर ही सामान्यजन को ज्ञात होता है कि भूत प्रेतादि किस प्रकार मनुष्य  को कष्ट पहुंचाते हैं और किस तरह सहज ही उन्हें कष्ट बाधाओं से मुक्ति मिल जाती है । दुखी कष्टग्रस्त व्यक्ति को मंदिर पहुंचकर तीनों देवगणों को प्रसाद चढाना पड़ता है । बालाजी को लड्डू प्रेतराज सरकार को चावल और कोतवाल कप्तान (भैरव) को उड़द का प्रसाद चढाया जाता है । इस प्रसाद में से दो लड्डू रोगी को खिलाए जाते हैं और शेष प्रसाद पशु पक्षियों को डाल दिया जाता है । ऐसा कहा जाता है कि पशु पक्षियों के रूप में देवताओं के दूत ही प्रसाद ग्रहण कर रहे होते हैं । प्रसाद हमेशा थाली या दोने में रखकर दिया जाता है । लड्डू खाते ही रोगी व्यक्ति झूमने लगता है और भूत प्रेतादि स्वयं ही उसके शरीर में आकर बड़बड़ाने लगते है । स्वतः ही वह हथकडी और बेड़ियों में जकड़ जाता है । कभी वह अपना सिर धुनता है कभी जमीन पर लोट पोट कर हाहाकार करता है । कभी बालाजी के इशारे पर पेड़  पर उल्टा लटक जाता है । कभी आग जलाकर उसमें कूद जाता है । कभी फ़ांसी या सूली पर लटक जाता है । मार से तंग आकर भूत प्रेतादि स्वतः ही बालाजी के चरणों में आत्मसमर्पण कर देते हैं अन्यथा समाप्त कर दिये जाते हैं । बालाजी उन्हें अपना दूत बना लेते हैं। संकट टल जाने पर बालाजी की ओर से एक दूत मिलता है जोकि रोग मुक्त व्यक्ति को भावी घटनाओं के प्रति सचेत करता रहता है । बालाजी महाराज के मन्दिर में प्रातः और सायं लगभग चार चार घंटे पूजा होती है । पूजा में भजन आरतियों और चालीसों का गायन होता है। इस समय भक्तगण जहां पंक्तिबद्ध हो देवताओं को प्रसाद अर्पित करते हैं वहीं भूत प्रेत से ग्रस्त रोगी चीखते चिल्लाते उलट पलट होते अपना दण्ड भुगतते हैं ।
श्री प्रेतराज सरकार
बालाजी मंदिर में प्रेतराज सरकार दण्डाधिकारी पद पर आसीन हैं। प्रेतराज सरकार के विग्रह पर भी चोला चढ़ाया जाता है। प्रेतराज सरकार को दुष्ट आत्माओं को दण्ड देने वाले देवता के रूप में पूजा जाता है ।  भक्ति-भाव से उनकी आरती, चालीसा, कीर्तन, भजन आदि किए जाते हैं । बालाजी के सहायक देवता के रूप में ही प्रेतराज सरकार की आराधना की जाती है।
पृथक रूप से उनकी आराधना उपासना कहीं नहीं की जाती, न ही उनका कहीं कोई मंदिर है। वेद,पुराण, धर्म ग्रन्थ आदि में कहीं भी प्रेतराज सरकार का उल्लेख नहीं मिलता। प्रेतराज श्रद्धा और भावना के देवता हैं।
कुछ लोग बालाजी का नाम सुनते ही चैंक पड़ते हैं। उनका मानना है कि भूत-प्रेतादि बाधाओं से ग्रस्त व्यक्ति को ही वहाँ जाना चाहिए। ऐसा सही नहीं है। कोई भी जो बालाजी के प्रति भक्ति-भाव रखने वाला है, इन तीनों देवों की आराधना कर सकता है। अनेक भक्त तो देश-विदेश से बालाजी के दरबार में मात्र प्रसाद चढ़ाने नियमित रूप से आते हैं।
किसी ने सच ही कहा है, नास्तिक भी आस्तिक बन जाते हैं, मेंहदीपुर दरबार में ।
प्रेतराज सरकार को पके चावल का भोग लगाया जाता है, किन्तु भक्तजन प्रायः तीनों देवताओं को बूंदी के लड्डुओं का ही भोग लगाते हैं और प्रेम-श्रद्धा से चढ़ा हुआ प्रसाद बाबा सहर्ष स्वीकार भी करते हैं।
कोतवाल कप्तान श्री भैरव देव
कोतवाल कप्तान श्री भैरव देव भगवान शिव के अवतार हैं और उनकी ही तरह भक्तों की थोड़ी सी पूजा-अर्चना से ही प्रसन्न भी हो जाते हैं । भैरव महाराज चतुर्भुजी हैं। उनके हाथों में त्रिशूल, डमरू,खप्पर तथा प्रजापति ब्रह्मा का पाँचवाँ कटा शीश रहता है । वे कमर में बाघाम्बर नहीं, लाल वस्त्र धारण करते हैं। वे भस्म लपेटते हैं । उनकी मूर्तियों पर चमेली के सुगंध युक्त तिल के तेल में सिन्दूर घोलकर चोला चढ़ाया जाता है ।
शास्त्र और लोककथाओं में भैरव देव के अनेक रूपों का वर्णन है, जिनमें एक दर्जन रूप प्रामाणिक हैं।  श्री बाल भैरव और श्री बटुक भैरव, भैरव देव के बाल रूप हैं। भक्तजन प्रायः भैरव देव के इन्हीं रूपों की आराधना करते हैं । भैरव देव बालाजी महाराज की सेना के कोतवाल हैं। इन्हें कोतवाल कप्तान भी कहा जाता है। बालाजी मन्दिर में आपके भजन, कीर्तन, आरती और चालीसा श्रद्धा से गाए जाते हैं । प्रसाद के रूप में आपको उड़द की दाल के वड़े और खीर का भोग लगाया जाता है। किन्तु भक्तजन बूंदी के लड्डू भी चढ़ा दिया करते हैं ।
सामान्य साधक भी बालाजी की सेवा-उपासना कर भूत-प्रेतादि उतारने में समर्थ हो जाते हैं। इस कार्य में बालाजी उसकी सहायता करते हैं। वे अपने उपासक को एक दूत देते हैं, जो नित्य प्रति उसके साथ रहता है।
कलियुग में बालाजी ही एकमात्र ऐसे देवता हैं , जो अपने भक्त को सहज ही अष्टसिद्धि, नवनिधि तदुपरान्त मोक्ष प्रदान कर सकते हैं ।

श्री बालाजी महाराज के नियम
श्री बालाजी महाराज जी के दर्शन हेतु जाने वाले यात्रियों एवं श्रध्दालुओ को निम्नलिखित नियमो का पालन अवश्य करना चाहिए—-
1 सवेरे तथा शाम के समय सभी यात्रियो को श्री बालाजी महाराज जी के सम्मुख उपस्थित होना चाहिए तथा ध्यान्पूर्वक भक्तिभाव से हरि कीर्तन व भजन सुनने और गाने चाहिएँ |
2 समस्त श्राध्दालुओ को वहाँ रहते हुए दूसरे यात्रियो व श्रध्द्लुओ के साथ स्नेह्पूर्ण व सहानुभूति का व्यावहार रखना चाहिए |
3 आरती के बाद सभी श्रध्दलुओ को श्री महन्त जी तथा अन्य भक्तो के साथ मिलकर दैनिक प्रार्थना वन्दना करनी चाहिए
4 यहाँ आकर धैर्यपूर्वक रहना चाहिए तथा व्यर्थ का वार्तालाप नही करना चाहिए और श्रध्दापूर्वक प्रसाद ग्रहण करना चाहिए |
5 जिन रोगियो को मार पडती हुई हो उनके लिए आस पास की जगह खाली छोड देनी चाहिए तथा समस्त उपस्थित भक्तो को जयकारो व भजनो के अलावा कोई भी वर्तालाप नही करना चाहिए |
6 सभी श्रध्दालुओ को श्री महन्त जी के साथ साथ श्री प्रेतराज सरकार जी के दरबार मे जाना चहिए और श्री महन्त जी के आदेश का पालन करना चाहिए और पूजा में व्यवधान नही डालना चाहिए |
7 आरती समाप्त होने पर श्रध्दालुओ को द्यान्पूर्वक शुध्द मन से श्री बालाजी की स्तुति प्रेम पूर्वक गानी चाहिए | श्रध्दालुओ को अपने हाथ से कोई भी पूजन सामग्री छूनी नही चाहिए तथा अ हि भोग लगाए और न ही चोला चढाए |
8 जो भी प्रशाद या अन्य वस्तु चढानी हो तो मंदिर के पुजारी को दे देनी चाहिए |रोगी यदि स्त्री है तो उसके साथ किसी पुरुष का होना आवश्यक है | अकेली स्त्री का मंदिर या धर्मशाला मे रहना वर्जित है |
9 श्रध्दालुओ को चाहिए कि वे जब तक वहाँ रहे पूर्णतः ब्रह्मचर्य का पालन करे तथा माँस, मदिरा,प्याज आदि का सेवन न करे |
किसी भी स्त्री को अपने हाथ से किसी भी देवता की प्रतिमा को नही छुना चाहिएँ |
संकट मुक्ति के लिए निम्नलिखित नियमों का पालन कठोरता से करना चाहिए |
1.    यात्री घर पर भूत बाधा से पीडित हो जावे तो उस समय उसके ऊपर से एक नारियल व थोडे से चावल लेकर लाल कपडे मे बाँधकर रोगीपर से उतार दे | सवा दो रुपये की दरखास्त रख दें और कह दे कि जो भी भूत बाधा हो कैद हो | मै श्री बालाजी को लेकर आऊगा | श्री बालाजी मंदिर मे जाकर के नारियल कपडा व दरखास्त बाबा के चरणो मे रख देवे और एक दरखास्त लगाकर प्रार्थना करे कि महाराज इस को ऊपर ही उपर खतम करो | जितने दिन बाबा के दरबार मे रहे रोज एक दरखास्त लगाते रहे | दरखास्त तीनो जगह लगेगी | बालाजी महाराज जी के मंदिर से दो लड्डू मिलेगे वह रोगी को खिला देवे |
2.  अर्जी रोगी के नाम से लगेगी जिसका समय सुबह सात बजे से ग्यारह बजे तक है | अर्जी १८१ रुपए की लगती है जिसमें लड्डू, उड्द और चावल होते है | दो लड्डू रोगी को श्री बालाजी के मंदिर में मिलेंगे वो उसको खाने चाहिएँ |
3.  अर्जी के बाद २.२५ पैसे की पेशी लगेगी यह पेशी आरती के पहले मंदिर में जमा कर देवें फिर आरती के बाद पेशी के दो लड्डू मंदिर से लेकर रोगी को खिला देवे | इतना करने पर भी पेशी नही आवे तो श्री भैरोजी का भोग लगावे. |
4.  श्री भैरोजी के भोग मे १०० ग्राम गुलगुले (मीठे पुआ ) लेकर श्री भैरोजी का भोग लगा दे | दो गुलगुले रोगी को खिला दे बाकी गुलगुले सात बार रोगी पर से वार कर कुत्तो को डाल दे |
5.  श्री प्रेतराज जी का भोग लगाना अनिवार्य है | खीर बनाकर श्री प्रेतराज जी का भोग लगा दे | बाकी खीर प्रसाद के रुप मे हर कोई ले सकता है |
6.  श्री दीवान सरकार जी का भोग अग्नि पर सात बताशे रख दे | दो इलायची, दो लोंग रख दें | २ अगरबत्ती लगा देवे | विनय करे कि संकट कटना चाहिए या पेशी आनी चाहिए | इतना करने पर भी पेशी नही आती तो भंगीवाडे का भोग लगाना चाहिए |
7.भंगीवाडे  का भोग अग्नि पर सात बताशे, दो लोंग, दो इलायची रख दे तथा उनका धुआँ लेना चाहिए | भंगीवाडे मे जाने से पहले नहाना व कपडे धोने चाहिएँ |
8. भूत बाधा यदि न बोलती हो और न हटती हो तो माँ काली जी का भोग लगाना अनिवार्य है और कहना चाहिए कि जो भी तंत्र-मंत्र चौकी हो कतनी चाहिए | पानी, बताशे, दो लौग, एक जायफल माँ काली जी के नाम से, माँ काली के मंदिर मे रख दे और प्रार्थना करे कि मेरे बंधन, चौकी कटनी चाहिए | पान चढाने के बाद थोडा रोगी को खिलादें |
9. संकट कटने के बाद पेशी के लड्डू खिलाना जरुरी है जिससे किसी प्रकार की शंका नही होती है | भूतों पर कभी विश्वास नही करना चाहिए ये हमेशा झूठ बोलते है |
10.संकट कट जाने के बाद रोगी को ४१ दिन का फरेज करना चाहिए तथा तेल काली मिर्च लौंग इत्यादि मंदिर से पढवानी चाहिए | रोगी को जमीन पर लेटाना चाहिए तथा अखंड ज्योति जलानी चाहिए | सुबह शाम बाबा कि पूजा करनी चाहिए तथा भजन कीर्तन करना चहिए | हरी सब्जी खाई जा सकती है |
11.  ४१ दिन का समय पुर्ण होने पर किसी कर्म काण्डी ब्राह्मण से हवन कराना चाहिए | हवन समाप्त होने पर रोगी कही भी जा सकता है तथा कुछ भी खा सकता है मादक वस्तुएँ निषेध है |
12.  मंगल या सनी को हे दुत बुलाना चाहिए इसके बिच नही, आपत्ती मे बुला सकते है | घाटा छोडने के पूर्व दरखास्त लगानी चाहिए कि बाबा हमें शक्तिशाली दूत दो, जो हमारी रक्षा करे |
13.  श्री बालाजी मे इतना करने पर भी संकट नही कटता या नही बोलता है और रोगी के रहने की परिशानी है तथा समय नही है तो संकत को लाल कपडे मे बाधकर कैद करवाकर के तथा नारियल को सात बार वार करके बालाजी के मंदिर मे दे दे फिर दर्खास्त लगा दे कि बाबा मेरे संकट कैद हो जाने चाहिएँ, उसके लड्डू वही छोड दे |
14.  घाटा छोडते समय महन्त जी महाराज से सलाह लेना अति अनिवार्य है |
15. अगर पित्रो का दोष है तो शेषनाग भगवान को सवा पाव कच्चा दूध और सवा पाव बताशो का भोग लगाना चाहिए |
16.  जो सज्जन श्री बालाजी महाराज जी के दर्शन हेतु या कोई मनोकामना के लिए घाटा मेहदीपुर श्री बालाजी के दरबार मे आते है वे सर्वप्रथम अपनी व अपने साथ आए हुए व्यक्तियो के आने की सवा दो रुपये की दरखास्त लगाते है जो यहाँ पर प्रसाद की दुकानो पर मिलती है | दरखास्त प्रत्येक व्यक्ति की अलग अलग लगेगी | उसके बाद जब आप वापसी के लिये आते है तो वापसी की दरखास्त लगाकर आयें | दरखास्त पहले श्री बालाजी महाराज जी को लगेगी जहाँ से दरखास्त मे से दो लड्डू दरखास्त लगाने के बाद निकाल ले फिर श्री भैरवजी की फिर श्री प्रेतराज सरकार जी की उसी दरखास्त मे से लगेगी | बाकी की दरखास्त श्री प्रेतराज सरकार जी के पीछे पहाडी पर सात बार अपने उपर से वार करके पीछे पहाडी पर डाल दे और वहा से बिना पीछे देखे अपनी धर्मशाला या बाहर आ जाए | जो लड्डू निकाले वो आप खा ले | इसी तरह मनोकामना की दरखास्त लगेगी और इसी तरह वापसी आने की लगेगी पर उस दरखास्त से लड्डू नही निकालने है | श्री बालाजी धाम मे किसी का दिया हुआ या किसी से प्रसाद लेकर न खाये | अपने घर से जो भी खाने- पीने का सामान लेकर आये हो उसे आप जहाँ ठहरे हो वही छोड दे |

17.  मेहदीपुर बालाजी दरबार मे (मुख्य मंदिर ) के अन्दर बालाजी महाराज का प्रसाद ( दो लड्डूऔ का पैकिट ) प्रत्येक भक्त को श्रध्दापूर्वक दिया जाता है | यात्री उसे स्वय ग्रहण करे अथवा घर ले जाकर परिवार मे बाँट सकते है |

Posted By Laxman Swatantra02:50

 
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