बीमारी का बगैर दवाई भी इलाज़ है,मगर मौत का कोई इलाज़ नहीं दुनियावी हिसाब किताब है कोई दावा ए खुदाई नहीं लाल किताब है ज्योतिष निराली जो किस्मत सोई को जगा देती है फरमान दे के पक्का आखरी दो लफ्ज़ में जेहमत हटा देती है

Tuesday, 17 October 2017

दीपावली के मुहूर्त विशेष महत्व रखते है.


इस वर्ष 19 अक्तूबर, 2017 के दिन दिवाली मनाई जाएगी. दीपावली के दिन लक्ष्मी पूजन शुभ समय मुहूर्त्त समय पर ही किया जाना चाहिए. पूजा को सांयकाल अथवा अर्द्धरात्रि को अपने शहर व स्थान के मुहुर्त्त के अनुसार ही करना चाहिए. दीपावली में अमावस्या तिथि, प्रदोष काल, शुभ लग्न व चौघाडिया मुहूर्त विशेष महत्व रखते है.19 अक्टूबर 2017, बृहस्पतिवार के दिन दिल्ली तथा आसपास के इलाकों में 17:48 से 20:22 तक प्रदोष काल रहेगा. इसे प्रदोष काल का समय कहा जाता है. प्रदोष काल समय को दिपावली पूजन के लिये शुभ मुहूर्त के रुप में प्रयोग किया जाता है. प्रदोष काल में भी स्थिर लग्न समय सबसे उतम रहता है.
वर्ष 2017 में कार्तिक माह की अमावस्या 19 अक्टूबर 2017, वीरवार, रात्रि 00:13* से प्रारंभ होकर 20 अक्टूबर 2017, शुक्रवार, रात्रि 00:41 पर समाप्त होगी।
वर्ष 2017 में दिवाली 19 अक्टूबर, वीरवार को मनाई जाएगी।
प्रदोष काल मुहूर्त शुभ समय
लक्ष्मी पूजा का शुभ मुहूर्त = 19:11 से 20:16
मुहूर्त की अवधि = 1 घंटा 5 मिनट
प्रदोष काल = 17:43 से 20:16
वृषभ काल = 19:11 से 21:06
महानिशिता काल मुहूर्त
लक्ष्मी पूजा का मुहूर्त = 23:40 से 24:31+ (20 अक्टूबर 2017 को 00:31) *(स्थिर लग्न के बिना)
मुहूर्त की अवधि = 0 घंटा 51 मिनट
महानिशिता काल = 23:40 से 24:31+ (20 अक्टूबर 2017 को 00:31)
सिंह काल = 25:41+ (20 अक्टूबर 2017 को 01:41) से 27:59+ (20 अक्टूबर 2017 को 03:59)
चौघड़िया पूजा मुहूर्त
दिवाली लक्ष्मी पूजन के लिए शुभ चौघड़िया मुहूर्त :
प्रातःकाल मुहूर्त (शुभ) = 06:28 से 07:53
प्रातःकाल मुहूर्त (चर, लाभ, अमृत) = 10:41 से 14:55
सायंकाल मुहूर्त (अमृत, चर) = 16:19 से 20:55

रात्रि मुहूर्त (लाभ) = 24:06+ (20 अक्टूबर 2017 को 00:06) से 24:41+ (20 अक्टूबर 2017 को 00:41)

Posted By Laxman Swatantra16:05

Thursday, 5 October 2017

शरद पूनम की रात को क्या करें, क्या न करें ?



अश्विनी कुमार देवताओं के वैद्य हैं । जो भी इन्द्रियाँ शिथिल हो गयी हों, उनको पुष्ट करने के लिए चन्द्रमा की चाँदनी में खीर रखना और भगवान को भोग लगाकर अश्विनी कुमारों से प्रार्थना करना कि 'हमारी इन्द्रियों का बल-ओज बढायें ।' फिर वह खीर खा लेना ।
शरद पूनम दमे की बीमारीवालों के लिए वरदान का दिन है । अपने सभी आश्रमों में निःशुल्क औषधि मिलती है, वह चन्द्रमा की चाँदनी में रखी हुई खीर में मिलाकर खा लेना और रात को सोना नहीं । दमे का दम निकल जायेगा ।
अमावस्या और पूर्णिमा को चन्द्रमा के विशेष प्रभाव से समुद्र में ज्वार-भाटा आता है । जब चन्द्रमा इतने बड़े दिगम्बर समुद्र में उथल-पुथल कर विशेष कम्पायमान कर देता है तो हमारे शरीर में जो जलीय अंश है, सप्तधातुएँ हैं, सप्त रंग हैं, उन पर भी चन्द्रमा का प्रभाव प‹डता है । इन दिनों में अगर काम-विकार भोगा तो विकलांग संतान अथवा जानलेवा बीमारी हो जाती है और यदि उपवास, व्रत तथा सत्संग किया तो तन तंदुरुस्त, मन प्रसन्न और बुद्धि में बुद्धिदाता का प्रकाश आता है ।
दशहरे से शरद पूनम तक चन्द्रमा की चाँदनी में विशेष हितकारी रस, हितकारी किरणें होती हैं । इन दिनों चन्द्रमा की चाँदनी का लाभ उठाना, जिससे वर्षभर आप स्वस्थ और प्रसन्न रहें । नेत्रज्योति बढ़ाने के लिए दशहरे से शरद पूर्णिमा तक प्रतिदिन रात्रि में १५ से २० मिनट तक चन्द्रमा के ऊपर त्राटक करें । 
इस रात सूई में धागा पिरोने का अभ्यास करने से नेत्रज्योति बढती है । 

Posted By Laxman Swatantra03:31

शरद पूनमः चन्द्र-दर्शन शुभ


🌷 इस रात को हजार काम छोड़कर 15 मिनट चन्द्रमा को एकटक निहारना। एक-आध मिनट आँखें पटपटाना। कम-से-कम 15 मिनट चन्द्रमा की किरणों का फायदा लेना, ज्यादा करो तो हरकत नहीं। इससे 32 प्रकार की पित्तसंबंधी बीमारियों में लाभ होगा, शांति होगी।
🌙 फिर छत पर या मैदान में विद्युत का कुचालक आसन बिछाकर लेटे-लेटे भी चंद्रमा को देख सकते हैं।
👁 जिनको नेत्रज्योति बढ़ानी हो वे शरद पूनम की रात को सूई में धागा पिरोने की कोशिश करें।
🙏🏻 इस रात्रि में ध्यान-भजन, सत्संग कीर्तन, चन्द्रदर्शन आदि शारीरिक व मानसिक आरोग्यता के लिए अत्यन्त लाभदायक हैं।
🌙 शरद पूर्णिमा की शीतल रात्रि में (9 से 12 बजे के बीच) छत पर चन्द्रमा की किरणों में महीन कपड़े से ढँककर रखी हुई दूध-पोहे अथवा दूध-चावल की खीर अवश्य खानी चाहिए। देर रात होने के कारण कम खायें, भरपेट न खायें, सावधानी बरतें।
💥 विशेष ~ 05 अक्टूबर 2017 गुरुवार को शरद पूनम है ।

Posted By Laxman Swatantra03:17

Monday, 2 October 2017

चार राशिचक्र तत्व हैं वायु, अग्नि, पृथ्वी और जल और उनमें से हरेक हमारे भीतर कार्यरत एक अनिवार्य प्रकार की उर्जा का प्रतिनिधित्व करते हैं

अंतर्गत लेख:

लाल किताब अनमोल

जल राशि
जल राशि के जातक असाधारण भावनात्मक और अति संवेदनशील लोग होते हैं। वे अत्यंत सहज होने के साथ ही समुद्र के समान रहस्यमयी भी हो सकते हैं। जल राशि की स्मृति तीक्ष्ण होती है और वे गहन वार्तालाप और अंतरंगता से प्यार करते है। वे खुले तौर पर अपनी आलोचना करते हैं और अपने प्रियजनों का समर्थन करने के लिए हमेशा मौजूद रहते हैं। जल राशियाँ हैं: कर्क, वृश्चिक और मीन।
अग्नि राशि
अग्नि राशि के जातक भावुक, गतिशील और मनमौजी प्रवृति के होते हैं। उन्हें गुस्सा जल्दी आता है, लेकिन वे सरलता से माफ भी कर देते हैं। वे विशाल ऊर्जा के साथ साहसी होते हैं। वे शारीरिक रूप से बहुत मजबूत और दूसरों के लिए प्रेरणा स्रोत होते हैं। अग्नि राशि के जातक हमेशा कार्रवाई के लिए तैयार, बुद्धिमान, स्वयं जागरूक, रचनात्मक और आदर्शवादी होते हैं। अग्नि राशियाँ हैं: मेष, सिंह और धनु।
पृथ्वी राशि
पृथ्वी राशि के लोग ग्रह पर "धरती" से जुड़े हुए होते हैं और वे हमें व्यवहारिक बनाते हैं। वे ज्यादातर रूढ़िवादी और यथार्थवादी होते हैं, लेकिन साथ ही वे बहुत भावुक भी हो सकते हैं। उन्हें विलासिता और भौतिक वस्तुओं से प्यार होता है। वे व्यावहारिक, वफादार और स्थिर होते हैं और वे कठिन समय में अपने लोगों का पूरा साथ देते हैं। पृथ्वी राशियाँ हैं: वृष, कन्या और मकर।
वायु राशि
वायु राशि के लोग अन्य लोगों के साथ संवाद करने और संबंध बनाने वाले होते हैं। वे मित्रवत्, बौद्धिक, मिलनसार, विचारक, और विश्लेषणात्मक लोग हैं। वे दार्शनिक विचार विमर्श, सामाजिक समारोह और अच्छी पुस्तकें पसंद करते हैं। सलाह देने में उन्हें आनंद आता है, लेकिन वे बहुत सतही भी हो सकती है। वायु राशियाँ हैं: मिथुन, तुला और कुंभ।

Posted By Laxman Swatantra09:17

Tuesday, 1 August 2017

नाराज भाई हो तो बहनें क्या करें


भाई का कारक ग्रह मंगल होता है। स्त्रियों की कुण्डली में मंगल अशुभ, नीच का या भावसन्धि में फंसा है तो भाई से रिश्तें अच्छे नहीं रहेंगे। बहनें रक्षा बन्धन के दिन सबसे पहले हनुमान जी को रखी बॉधे और उसके बाद भाई को राखी बॉधते वक्त हनुमान जी की दाहिने भुजा से लिया हुआ वन्दन भाई को लगायें। ऐसा करने से आपस में प्रेम सम्बन्ध मजबूत होंगे। आज के दिन बहनें सुन्दर काण्ड का पाठ करके भाई को राखी बॉधें तथा बेसन लडडू खिलायें। बहनें अपनें भाईयों को गहरे लाल रंग का कोई उपहार दें।

रक्षाबन्धन के दिन बहनें अपनें भाईयों को अपने हाथों से भोजन करायें तथा केसर युक्त कोई मीठी वस्तु अवश्य खिलायें। भाई को राखी बॉधते समय बहन मन में कार्तिकेय भगवान का स्मरण करें। हे कार्तिकेय जी मेरे और भाई के बीच रिश्तें हमेशा मधुर बनें।

Posted By Laxman Swatantra07:38

रक्षाबंधन 2017: राखी बांधने का सही मुहूर्त एवं समय

अंतर्गत लेख:

भाई-बहन के असीम स्नेह का पर्व रक्षाबंधन 7 अगस्त को है लेकिन इस बार इस त्योहार पर भद्रा के साथ ही चंद्रग्रहण का साया भी रहेगा। करीब 12 साल बाद ऐसा संयोग बना है जब राखी के दिन ग्रहण लग रहा है। इसलिए इस बार राखी के दिन सूतक भी लगेगा।
रक्षा बन्धन अनुष्ठान का समय = ११:०४ से २१:१२
अवधि = १० घण्टे ८ मिनट्स
रक्षा बन्धन के लिये अपराह्न का मुहूर्त = १३:४६ से १६:२४
अवधि = २ घण्टे ३८ मिनट्स
रक्षा बन्धन के लिये प्रदोष काल का मुहूर्त = १९:०३ से २१:१२
अवधि = २ घण्टे ९ मिनट्स
भद्रा पूँछ = ०६:४० से ०७:५५
भद्रा मुख = ०७:५५ से १०:०१
भद्रा अन्त समय = ११:०४
पूर्णिमा तिथि प्रारम्भ = ६/अगस्त/२०१७ को २२:२८ बजे
पूर्णिमा तिथि समाप्त = ७/अगस्त/२०१७ को २३:४० बजे

Posted By Laxman Swatantra07:31

Saturday, 29 April 2017

शकुन शास्त्र से हम बड़ी ही आसानी से जान सकते हैं भाग्य देगा आपका साथ




शकुन शास्त्र से हम बड़ी ही आसानी से जान सकते हैं कि निकट भविष्य में (यानी आज के दिन) हमारे साथ क्या होने वाला है  शकुन शास्त्र से हम बड़ी ही आसानी से जान सकते हैं कि निकट भविष्य में (यानी आज के दिन) हमारे साथ क्या होने वाला है। ज्योतिष की इस प्राचीन विद्या में कुछ ऐसे संकेत बताए गए हैं जिनके दिखने से आपके पूरे दिन का अंदाजा सहज ही लग जाता है। आपको इसके लिए केवल कुछ छोटी-छोटी लेकिन बहुत महत्वपूर्ण बातों पर ध्यान देना होगा। पढ़िए ऐसे ही 10 संकेतों के बारे में....
(1) सुबह उठते ही यदि आपको नारियल, शंख, मोर, हंस या सुगंधित फूल दिखाई दे तो पूरा दिन शुभ गुजरता है। कही से कोई बड़ा आर्थिक लाभ भी मिलता है।
(2) घर से निकलते समय यदि कोई सुहागिन स्त्री पूजा की थाली हाथ में लिए या पूरे सोलह श्रृंगार में जाते हुए दिखाई दें तो उस दिन आपकी सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं।
(3) घर से निकलते समय सफाईकर्मी का दिखना या रास्ता काटना बहुत शुभ होता है। इससे मनचाही इच्छा पूरी होती है।
(4) यदि किसी काम पर जाते समय पीछे से छींक सुनाई दें तो यह कार्य पूरा होने का संकेत है। रूकें नहीं, तुरन्त प्रस्थान करें।
(5) यदि घर से निकलते ही सफेद गाय दिखाई दे तो यह बहुत शुभ संकेत माना जाता है।
(6) किसी काम पर जाते समय सफेद सांप का दिखना कार्य के पूरा होने की निशानी है।
(7) शुक्रवार के दिन घर से बाहर निकलते समय अगर कोई छोटी कन्या पानी से भरा हुआ कलश (मटका) उठाए दिखे तो यह निकट भविष्य में धनलाभ होने की संभावनाएं बताता है। परन्तु कलश का खाली होना आर्थिक नुकसान का इशारा है।
(8) सुबह उठते ही भगवान के दर्शन हो या शंख, मंदिर की घंटियों की आवाजें सुनाई दें तो व्यक्ति का पूरा दिन बहुत अच्छा गुजरता है।
(9) घर से निकलते समय यदि कोई वृद्ध स्त्री (अथवा माता) आर्शीवाद दे तो इसे दैवीय कृपा मान कर काम की सफलता सुनिश्चित माननी चाहिए।
(10) किसी काम पर जाते समय सीधे हाथ पर सांप, कुत्ता, मोर अथवा बंदर दिखने शुभ समाचार लाता है।

Posted By Laxman Swatantra07:55

गीता में ढेरों ज्योतिषीय उपचार भी छिपे हुए हैं



गीता को ज्योतिषीय आधार पर विश्लेषित किया जाए तो इसमें ग्रहों का प्रभाव और उनसे होने वाले नुकसान से बचने और उनका लाभ उठाने के संकेत स्पष्ट दिखाई देते हैं।

महाभारत के युद्ध से ठीक पहले श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दिए गए ज्ञान यानी गीता में ढेरों ज्योतिषीय उपचार भी छिपे हुए हैं। गीता के अध्यायों का नियमित अध्ययन कर हम कई समस्याओं से मुक्ति पा सकते हैं।

गीता की टीका तो बहुत से योगियों और महापुरूषों ने की है लेकिन ज्योतिषीय अंदाज में अब तक कहीं पुख्ता टीका नहीं है। फिर भी कहीं-कहीं ज्योतिषियों ने अपने स्तर पर प्रयोग किए हैं और ये बहुत अधिक सफल भी रहे हैं। गीता की नैसर्गिक विशेषता यह है कि पढ़ने वाले व्यक्ति के अनुसार ही इसकी टीका होती है। यानी हर एक के लिए अलग। इन संकेतों के साथ इस स्वतंत्रता को बनाए रखने का प्रयास किया है।

गीता के अठारह अध्यायों में भगवान श्रीकृष्ण ने जो संकेत दिए हैं, उन्हें ज्योतिष के आधार पर विश्लेषित किया गया है। इसमें ग्रहों का प्रभाव और उनसे होने वाले नुकसान से बचने और उनका लाभ उठाने के संबंध में यह सूत्र बहुत काम के लगते हैं।

शनि संबंधी पीड़ा होने पर प्रथम अध्याय का पठन करना चाहिए। द्वितीय अध्याय, जब जातक की कुंडली में गुरू की दृष्टि शनि पर हो, तृतीय अध्याय 10वां भाव शनि, मंगल और गुरू के प्रभाव में होने पर, चतुर्थ अध्याय कुंडली का 9वां भाव तथा कारक ग्रह प्रभावित होने पर, पंचम अध्याय भाव 9 तथा 10 के अंतरपरिवर्तन में लाभ देते हैं। इसी प्रकार छठा अध्याय तात्कालिक रूप से आठवां भाव एवं गुरू व शनि का प्रभाव होने और शुक्र का इस भाव से संबंधित होने पर लाभकारी है।

सप्तम अध्याय का अध्ययन 8वें भाव से पीडित और मोक्ष चाहने वालों के लिए उपयोगी है। आठवां अध्याय कुंडली में कारक ग्रह और 12वें भाव का संबंध होने पर लाभ देता है। नौंवे अध्याय का पाठ लग्नेश, दशमेश और मूल स्वभाव राशि का संबंध होने पर करना चाहिए। गीता का दसवां अध्याय कर्म की प्रधानता को इस भांति बताता है कि हर जातक को इसका अध्ययन करना चाहिए।

कुंडली में लग्नेश 8 से 12 भाव तक सभी ग्रह होने पर ग्यारहवें अध्याय का पाठ करना चाहिए। बारहवां अध्याय भाव 5 9 तथा चंद्रमा प्रभावित होने पर उपयोगी है। तेरहवां अध्याय भाव 12 तथा चंद्रमा के प्रभाव से संबंधित उपचार में काम आएगा। आठवें भाव में किसी भी उच्च ग्रह की उपस्थिति में चौदहवां अध्याय लाभ दिलाएगा। प ंद्रहवां अध्याय लग्न एवं 5वें भाव के संबंध में और सोलहवां मंगल और सूर्य की खराब स्थिति में उपयोगी है।


Posted By Laxman Swatantra07:41

Thursday, 6 October 2016

दुर्गा सप्तशती के रहस्य

अंतर्गत लेख:

दुर्गा सप्तशती के रहस्य

सनातन धर्म में मुख्यत: पांच उपास्य-देव माने गए हैं- सूर्य, गणेश, दुर्गा, शंकर और विष्णु, परंतु कलियुग में दुर्गा और गणेश का विशेष महत्व है, ‘कलौ चण्डी विनायकै।’ मां दुर्गा परमेश्वर की उन प्रधान शक्तियों में से एक हैं जिनको आवश्यकतानुसार उन्होंने समय-समय पर प्रकट किया है। उसी दुर्गा शक्ति की उत्पत्ति तथा उनके ‍चरित्रों का वर्णन मार्कण्डेय पुराणांतर्गत देवी माहात्म्य में है।
यह देवी माहात्म्य 700 श्लोकों में वर्णित है। यह माहात्म्य ‘दुर्गा सप्तशती’ के नाम से जाना जाता है। मां आदिशक्ति प्रकृति स्वरूपा भी हैं। पुराने समय से ही प्रकृतिजनित बाधाओं से भयभीत होकर मनुष्य ने मां की आराधना की है। हर युग में शक्ति स्वरूपा नारी, परिवार और समाज का केन्द्र रही है। समय-समय पर समाज की सुरक्षा और समृद्धि को सुनिश्चित करने का कार्य नारी ने किया है। दुर्गा सप्तशती कीआराधना और पाठ के बारे में बता रहे हैं। 
आदिशक्ति का स्मरण आते ही ‘मां’ शब्द अपने आप ही अंत:करण पर आ जाता है। मां आदिशक्ति की आराधना की चर्चा ही ‘दुर्गा सप्तशती’ से प्रारम्भ होती है। ‘दुर्गा सप्तशती’ में सात सौ श्लोक हैं, जिन्हें मूलत: तीन चरित्र, प्रथम, मध्यम और उत्तम चरित्र में विभाजित किया गया है। महाकाली के आराधनायुक्त प्रथम चरित्र में केवल पहला अध्याय, मध्यम चरित्र में दूसरे से चौथा यानी तीन अध्याय हैं। इसमें मां लक्ष्मी के स्वरूप का वर्णन है, जबकि उत्तम चरित्र में मां सरस्वती की आराधना के पांच से तेरह यानी नौ अध्याय हैं। दुर्गा सप्तशती में प्रारम्भ और अंत में वर्णित देवी कवच, अर्गला, कीलक तथा सिद्ध कुंजिका स्तोत्र के साथ ही साथ राशि के अनुसार एक अध्याय का भी पठन नवरात्र के नौ दिनों में किया जाए तो जीवन में मंगल होता है। मेष: आप मंगल प्रधान हैं। केतु, शुक्र और सूर्य से भी प्रभावित हैं। 
आपको दुर्गा सप्तशती के पहले अध्याय के पठन से क्रोध और अवसाद से मुक्ति मिलगी। धन लाभ भी होगा। वृषभ: आप शुक्र प्रधान हैं। सूर्य,चन्द्र और मंगल से प्रभावित होने के कारण बुद्धि और भावनाओं के सामंजस्य में त्रुटि कर बैठती हैं। आपको दुर्गा सप्तशती के द्वितीय अध्याय का पठन पूरे नौ दिन करना चाहिये। अर्गला स्तोत्र का भी पाठ करें। मिथुन: आप बुध प्रधान हैं और मंगल, राहु और गुरु से प्रभावित भी। आप महत्वाकांक्षी तो है, पर आपसे आपके अधिकारी प्रसन्न नहीं रहते। अपनी समस्या के हल हेतु नौ दिन दुर्गा सप्तशती के सातवें अध्याय का पाठ करें, लाभ होगा। कर्क: आप चन्द्र प्रधान हैं और गुरु, शनि और बुध ग्रहों से प्रभावित हैं। आप अपनी वाणी और भावनात्मक आवेग पर नियंत्रण कर जीवन में सफल हो सकती हैं। दुर्गा सप्तशती के पांचवें अध्याय का नौ दिन पाठ करें, यश बढ़ेगा। सिंह: आप सूर्य प्रधान हैं। केतु व शुक्र भी आपको प्रभावित करते हैं। निर्णय लेने में हुई त्रुटि का आपके जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ता रहा है। पारिवारिक शांति के लिये प्रयास करें। दुर्गा सप्तशती के तृतीय अध्याय का पाठ नौ दिन करें। कन्या: आपका बुध प्रधान होना आपको निर्णय लेने की अद्भुत योग्यता देता है। आप सूर्य, चन्द्र और मंगल ग्रह से प्रभावित हैं। नौ दिन दुर्गा सप्तशती के दसवें अध्याय का पाठ करें। आप भयमुक्त और चिंतारहित होंगी। तुला: आप शुक्र ग्रह से प्रभावित हैं। मंगल, राहु और गुरु भी आपके व्यक्तित्व पर प्रभाव डालते हैं। दुर्गा सप्तशती के छठे अध्याय का पाठ करने से ऐश्वर्य और मानसिक शांति मिलेगी। वृश्चिक: आपकी राशि का स्वामी मंगल है। गुरु, शनि व बुध से भी प्रभावित हैं। आपको अपनी व्यावहारिक कुशलता को बनाये रखना होगा और वाणी में मधुरता लानी होगी। दुर्गा सप्तशती के आठवें अध्याय का निरंतर पाठ करें। धनु: गुरु के साथ आपको केतु, शुक्र और सूर्य प्रभावित करते हैं। दुर्गा सप्तशती के ग्यारहवें अध्याय के पठन से पद- प्रतिष्ठा और शांति प्राप्त होगी। पूरे नौ दिन रात्रि सूक्त का भी पठन करें। मकर: आप शनि प्रधान हैं, साथ ही सूर्य, चन्द्र और मंगल से प्रभावित भी। न्याय की आस में आपका जीवन गुजरता है। न्याय की प्राप्ति और जीवन में अतुलनीय प्रगति के लिये दुर्गा सप्तशती के आठवें अध्याय का पठन करें। कुम्भ: शनि प्रधान होने के कारण आप हठी हैं। मंगल, राहु और गुरु से प्रभावित होने के कारण दयालु भी हैं। अस्थिर रहती हैं। दुर्गा सप्तशती के चतुर्थ अध्याय का पाठ पूरे नौ दिन करें। मीन: आप गुरु प्रधान हैं और शनि तथा बुध से प्रभावित। वैचारिक सामंजस्य ठीक न होने से चिंतित रहती हैं। व्यवसाय और विवाह संबंधी समस्याएं हो सकती हैं। दुर्गा सप्तशती के नवम अध्याय के पाठ से लाभ होगा।

Posted By Laxman Swatantra00:55

Saturday, 1 October 2016

सकारात्मक ऊर्जा,का वैज्ञानिक कारण

अंतर्गत लेख:


दीपक के ऊपर हाथ घुमाने का वैज्ञानिक कारण 
आरती के बाद सभी लोग दिए पर या कपूर के ऊपर हाथ रखते हैं और उसके बाद सिर से लगाते हैं और आंखों पर स्पर्श करते हैं। ऐसा करने से हल्के गर्म हाथों से दृष्टि इंद्री सक्रिय हो जाती है और बेहतर महसूस होता है। 
मंदिर में घंटा लगाने का कारण 
जब भी मंदिर में प्रवेश किया जाता है तो दरवाजे पर घंटा टंगा होता है जिसे बजाना होता है। मुख्य मंदिर (जहां भगवान की मूर्ति होती है) में भी प्रवेश करते समय घंटा या घंटी बजानी होती है, इसके पीछे कारण यह है कि इसे बजाने से निकलने वाली आवाज से सात सेकंड तक गूंज बनी रहती है जो शरीर के सात हीलिंग सेंटर्स को सक्रिय कर देती है। 
भगवान की मूर्ति
मंदिर में भगवान की मूर्ति को गर्भ गृह के बिल्कुल बीच में रखा जाता है। ऐसा माना जाता है कि इस जगह पर सबसे अधिक ऊर्जा होती है जहां सकारात्मक सोच से खड़े होने पर शरीर में सकारात्मक ऊर्जा पहुंचती है और नकारात्मकता दूर भाग जाती है। 
परिक्रमा करने के पीछे वैज्ञानिक कारण 
हर मुख्य मंदिर में दर्शन करने और पूजा करने के बाद परिक्रमा करनी होती है। जब मंदिर में परिक्रमा की जाती है तो सारी सकारात्मक ऊर्जा, शरीर में प्रवेश कर जाती है और मन को शांति मिलती है।
चप्पल बाहर क्यों उतारते हैं 
मंदिर में प्रवेश नंगे पैर ही करना पड़ता है, यह नियम दुनिया के हर हिंदू मंदिर में है। इसके पीछे वैज्ञानिक कारण यह है कि मंदिर की फर्शों का निर्माण पुराने समय से अब तक इस प्रकार किया जाता है कि ये इलेक्ट्रिक और मैग्नैटिक तरंगों का सबसे बड़ा स्त्रोत होती हैं। जब इन पर नंगे पैर चला जाता है तो अधिकतम ऊर्जा पैरों के माध्यम से शरीर में प्रवेश कर जाती है। 

Posted By Laxman Swatantra11:17

 
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