बीमारी का बगैर दवाई भी इलाज़ है,मगर मौत का कोई इलाज़ नहीं दुनियावी हिसाब किताब है कोई दावा ए खुदाई नहीं लाल किताब है ज्योतिष निराली जो किस्मत सोई को जगा देती है फरमान दे के पक्का आखरी दो लफ्ज़ में जेहमत हटा देती है

Thursday, 6 October 2016

दुर्गा सप्तशती के रहस्य

अंतर्गत लेख:

दुर्गा सप्तशती के रहस्य

सनातन धर्म में मुख्यत: पांच उपास्य-देव माने गए हैं- सूर्य, गणेश, दुर्गा, शंकर और विष्णु, परंतु कलियुग में दुर्गा और गणेश का विशेष महत्व है, ‘कलौ चण्डी विनायकै।’ मां दुर्गा परमेश्वर की उन प्रधान शक्तियों में से एक हैं जिनको आवश्यकतानुसार उन्होंने समय-समय पर प्रकट किया है। उसी दुर्गा शक्ति की उत्पत्ति तथा उनके ‍चरित्रों का वर्णन मार्कण्डेय पुराणांतर्गत देवी माहात्म्य में है।
यह देवी माहात्म्य 700 श्लोकों में वर्णित है। यह माहात्म्य ‘दुर्गा सप्तशती’ के नाम से जाना जाता है। मां आदिशक्ति प्रकृति स्वरूपा भी हैं। पुराने समय से ही प्रकृतिजनित बाधाओं से भयभीत होकर मनुष्य ने मां की आराधना की है। हर युग में शक्ति स्वरूपा नारी, परिवार और समाज का केन्द्र रही है। समय-समय पर समाज की सुरक्षा और समृद्धि को सुनिश्चित करने का कार्य नारी ने किया है। दुर्गा सप्तशती कीआराधना और पाठ के बारे में बता रहे हैं। 
आदिशक्ति का स्मरण आते ही ‘मां’ शब्द अपने आप ही अंत:करण पर आ जाता है। मां आदिशक्ति की आराधना की चर्चा ही ‘दुर्गा सप्तशती’ से प्रारम्भ होती है। ‘दुर्गा सप्तशती’ में सात सौ श्लोक हैं, जिन्हें मूलत: तीन चरित्र, प्रथम, मध्यम और उत्तम चरित्र में विभाजित किया गया है। महाकाली के आराधनायुक्त प्रथम चरित्र में केवल पहला अध्याय, मध्यम चरित्र में दूसरे से चौथा यानी तीन अध्याय हैं। इसमें मां लक्ष्मी के स्वरूप का वर्णन है, जबकि उत्तम चरित्र में मां सरस्वती की आराधना के पांच से तेरह यानी नौ अध्याय हैं। दुर्गा सप्तशती में प्रारम्भ और अंत में वर्णित देवी कवच, अर्गला, कीलक तथा सिद्ध कुंजिका स्तोत्र के साथ ही साथ राशि के अनुसार एक अध्याय का भी पठन नवरात्र के नौ दिनों में किया जाए तो जीवन में मंगल होता है। मेष: आप मंगल प्रधान हैं। केतु, शुक्र और सूर्य से भी प्रभावित हैं। 
आपको दुर्गा सप्तशती के पहले अध्याय के पठन से क्रोध और अवसाद से मुक्ति मिलगी। धन लाभ भी होगा। वृषभ: आप शुक्र प्रधान हैं। सूर्य,चन्द्र और मंगल से प्रभावित होने के कारण बुद्धि और भावनाओं के सामंजस्य में त्रुटि कर बैठती हैं। आपको दुर्गा सप्तशती के द्वितीय अध्याय का पठन पूरे नौ दिन करना चाहिये। अर्गला स्तोत्र का भी पाठ करें। मिथुन: आप बुध प्रधान हैं और मंगल, राहु और गुरु से प्रभावित भी। आप महत्वाकांक्षी तो है, पर आपसे आपके अधिकारी प्रसन्न नहीं रहते। अपनी समस्या के हल हेतु नौ दिन दुर्गा सप्तशती के सातवें अध्याय का पाठ करें, लाभ होगा। कर्क: आप चन्द्र प्रधान हैं और गुरु, शनि और बुध ग्रहों से प्रभावित हैं। आप अपनी वाणी और भावनात्मक आवेग पर नियंत्रण कर जीवन में सफल हो सकती हैं। दुर्गा सप्तशती के पांचवें अध्याय का नौ दिन पाठ करें, यश बढ़ेगा। सिंह: आप सूर्य प्रधान हैं। केतु व शुक्र भी आपको प्रभावित करते हैं। निर्णय लेने में हुई त्रुटि का आपके जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ता रहा है। पारिवारिक शांति के लिये प्रयास करें। दुर्गा सप्तशती के तृतीय अध्याय का पाठ नौ दिन करें। कन्या: आपका बुध प्रधान होना आपको निर्णय लेने की अद्भुत योग्यता देता है। आप सूर्य, चन्द्र और मंगल ग्रह से प्रभावित हैं। नौ दिन दुर्गा सप्तशती के दसवें अध्याय का पाठ करें। आप भयमुक्त और चिंतारहित होंगी। तुला: आप शुक्र ग्रह से प्रभावित हैं। मंगल, राहु और गुरु भी आपके व्यक्तित्व पर प्रभाव डालते हैं। दुर्गा सप्तशती के छठे अध्याय का पाठ करने से ऐश्वर्य और मानसिक शांति मिलेगी। वृश्चिक: आपकी राशि का स्वामी मंगल है। गुरु, शनि व बुध से भी प्रभावित हैं। आपको अपनी व्यावहारिक कुशलता को बनाये रखना होगा और वाणी में मधुरता लानी होगी। दुर्गा सप्तशती के आठवें अध्याय का निरंतर पाठ करें। धनु: गुरु के साथ आपको केतु, शुक्र और सूर्य प्रभावित करते हैं। दुर्गा सप्तशती के ग्यारहवें अध्याय के पठन से पद- प्रतिष्ठा और शांति प्राप्त होगी। पूरे नौ दिन रात्रि सूक्त का भी पठन करें। मकर: आप शनि प्रधान हैं, साथ ही सूर्य, चन्द्र और मंगल से प्रभावित भी। न्याय की आस में आपका जीवन गुजरता है। न्याय की प्राप्ति और जीवन में अतुलनीय प्रगति के लिये दुर्गा सप्तशती के आठवें अध्याय का पठन करें। कुम्भ: शनि प्रधान होने के कारण आप हठी हैं। मंगल, राहु और गुरु से प्रभावित होने के कारण दयालु भी हैं। अस्थिर रहती हैं। दुर्गा सप्तशती के चतुर्थ अध्याय का पाठ पूरे नौ दिन करें। मीन: आप गुरु प्रधान हैं और शनि तथा बुध से प्रभावित। वैचारिक सामंजस्य ठीक न होने से चिंतित रहती हैं। व्यवसाय और विवाह संबंधी समस्याएं हो सकती हैं। दुर्गा सप्तशती के नवम अध्याय के पाठ से लाभ होगा।

Posted By Laxman Swatantra00:55

Saturday, 1 October 2016

सकारात्मक ऊर्जा,का वैज्ञानिक कारण

अंतर्गत लेख:


दीपक के ऊपर हाथ घुमाने का वैज्ञानिक कारण 
आरती के बाद सभी लोग दिए पर या कपूर के ऊपर हाथ रखते हैं और उसके बाद सिर से लगाते हैं और आंखों पर स्पर्श करते हैं। ऐसा करने से हल्के गर्म हाथों से दृष्टि इंद्री सक्रिय हो जाती है और बेहतर महसूस होता है। 
मंदिर में घंटा लगाने का कारण 
जब भी मंदिर में प्रवेश किया जाता है तो दरवाजे पर घंटा टंगा होता है जिसे बजाना होता है। मुख्य मंदिर (जहां भगवान की मूर्ति होती है) में भी प्रवेश करते समय घंटा या घंटी बजानी होती है, इसके पीछे कारण यह है कि इसे बजाने से निकलने वाली आवाज से सात सेकंड तक गूंज बनी रहती है जो शरीर के सात हीलिंग सेंटर्स को सक्रिय कर देती है। 
भगवान की मूर्ति
मंदिर में भगवान की मूर्ति को गर्भ गृह के बिल्कुल बीच में रखा जाता है। ऐसा माना जाता है कि इस जगह पर सबसे अधिक ऊर्जा होती है जहां सकारात्मक सोच से खड़े होने पर शरीर में सकारात्मक ऊर्जा पहुंचती है और नकारात्मकता दूर भाग जाती है। 
परिक्रमा करने के पीछे वैज्ञानिक कारण 
हर मुख्य मंदिर में दर्शन करने और पूजा करने के बाद परिक्रमा करनी होती है। जब मंदिर में परिक्रमा की जाती है तो सारी सकारात्मक ऊर्जा, शरीर में प्रवेश कर जाती है और मन को शांति मिलती है।
चप्पल बाहर क्यों उतारते हैं 
मंदिर में प्रवेश नंगे पैर ही करना पड़ता है, यह नियम दुनिया के हर हिंदू मंदिर में है। इसके पीछे वैज्ञानिक कारण यह है कि मंदिर की फर्शों का निर्माण पुराने समय से अब तक इस प्रकार किया जाता है कि ये इलेक्ट्रिक और मैग्नैटिक तरंगों का सबसे बड़ा स्त्रोत होती हैं। जब इन पर नंगे पैर चला जाता है तो अधिकतम ऊर्जा पैरों के माध्यम से शरीर में प्रवेश कर जाती है। 

Posted By Laxman Swatantra11:17

माँ दुर्गा के नौ रूपों की अराधना का पावन पर्व शुरू

अंतर्गत लेख:

आद्यशक्ति की उपासना का पर्व : नवरात्र
1 से 10 अक्टूबर

नवरात्रि पर देवी पूजन और नौ दिन के व्रत का बहुत महत्व है । माँ दुर्गा के नौ रूपों की अराधना का पावन पर्व शुरू हो रहा है ।
नवरात्रि एक बड़ा हिंदू पर्व है । नवरात्रि एक संस्कृत शब्द है, जिसका अर्थ होता है 'नौ रातें' । इन नौ रातों और दस दिनों के दौरान, शक्ति (देवी) के नौ रूपों की पूजा की जाती है । दसवाँ दिन दशहरा के नाम से प्रसिद्ध है ।
नवरात्रि वर्ष में चार बार आता है । पौष, चैत्र, आषाढ,अश्विन प्रतिपदा से नवमी तक मनाया जाता है । नवरात्रि के नौ रातों में तीन देवियों - महालक्ष्मी, महासरस्वती या सरस्वती और दुर्गा के नौ स्वरुपों की पूजा होती है जिन्हें नवदुर्गा कहते हैं ।  इन नौ रातों और दस दिनों के दौरान, शक्ति (देवी) के नौ रूपों की पूजा की जाती है । दुर्गा का मतलब जीवन के दुख कॊ हटानेवाली होता है । नवरात्रि एक महत्वपूर्ण प्रमुख त्यौहार है जिसे पूरे भारत और अन्य देशों में महान उत्साह के साथ मनाया जाता है ।
आश्विन शुक्लपक्ष की प्रतिपदा से नवमी तिथि तक का पर्व शारदीय नवरात्र के रूप में जाना जाता है । यह व्रत-उपवास व जप-ध्यान का पर्व है ।
🚩‘श्रीमद्देवी भागवत’ में आता है कि विद्या, धन व पुत्र के अभिलाषी को नवरात्र-व्रत का अनुष्ठान करना चाहिए । जिसका राज्य छिन गया हो, ऐसे नरेश को पुनः गद्दी पर बिठाने की क्षमता इस व्रत में है ।
नौ देवियाँ है :-
शैलपुत्री - इसका अर्थ- पहाड़ों की पुत्री होता है ।
ब्रह्मचारिणी - इसका अर्थ- ब्रह्मचारीणी ।
चंद्रघंटा - इसका अर्थ- चाँद की तरह चमकने वाली ।
कूष्माण्डा - इसका अर्थ- पूरा जगत उनके पैर में है ।
स्कंदमाता - इसका अर्थ- कार्तिक स्वामी की माता ।
कात्यायनी - इसका अर्थ- कात्यायन आश्रम में जन्मि ।

कालरात्रि - इसका अर्थ- काल का नाश करने वली ।
महागौरी - इसका अर्थ- सफेद रंग वाली माँ ।
सिद्धिदात्री - इसका अर्थ- सर्व सिद्धि देने वाली ।
शक्ति की उपासना का पर्व शारदीय नवरात्र प्रतिपदा से नवमी तक निश्चित नौ तिथि, नौ नक्षत्र, नौ शक्तियों की नवधा भक्ति के साथ सनातन काल से मनाया जा रहा है ।
सर्वप्रथम भगवान श्रीरामचंद्रजी ने इस शारदीय नवरात्रि पूजा काप्रारंभ समुद्र तट पर किया था और उसके बाद दसवें दिन लंका विजय के लिए प्रस्थान किया और विजय प्राप्त की । तब से असत्य पर सत्य, अधर्म पर धर्म की जीत का पर्व दशहरा मनाया जाने लगा ।
आदिशक्ति के हर रूप की नवरात्र के नौ दिनों में क्रमशः अलग-अलग पूजा की जाती है । माँ दुर्गा की नौवीं शक्ति का नाम सिद्धिदात्री है । ये सभी प्रकार की सिद्धियाँ देने वाली हैं । इनका वाहन सिंह है और कमल पुष्प पर ही आसीन होती हैं । नवरात्रि के नौवें दिन इनकी उपासना की जाती है ।
नवदुर्गा और दस महाविद्याओं में काली ही प्रथम प्रमुख हैं । भगवान शिव की शक्तियों में उग्र और सौम्य, दो रूपों में अनेक रूप धारण करने वाली दश महाविद्या अनंत सिद्धियाँ प्रदान करने में समर्थ हैं । दसवें स्थान पर कमला वैष्णवी शक्ति हैं, जो प्राकृतिक संपत्तियों की अधिष्ठात्री देवी लक्ष्मी हैं । देवता, मानव, दानव सभी इनकी कृपा के बिना पंगु हैं, इसलिए आगम-निगम दोनों में इनकी उपासना समान रूप से वर्णित है । सभी देवता, राक्षस, मनुष्य, गंधर्व इनकी कृपा-प्रसाद के लिए लालायित रहते हैं ।
नवरात्रि भारत के विभिन्न भागों में अलग ढंग से मनायी जाती है । गुजरात में इस त्योहार को बड़े पैमाने से मनाया जाता है । गुजरात में नवरात्रि समारोह डांडिया और गरबा के रूप में जान पडता है । यह आधीरात तक चलता है । डांडिया का अनुभव बडा ही असाधारण है । देवी के सम्मान में भक्ति प्रदर्शन के रूप में गरबा, 'आरती' से पहले किया जाता है और डांडिया समारोह उसके बाद । पश्चिम #बंगाल के राज्य में बंगालियों के मुख्य त्यौहारो में दुर्गा पूजा बंगाली कैलेंडर में, सबसे अलंकृत रूप में उभरा है । इस अदभुत उत्सव का जश्न नीचे दक्षिण, मैसूर के राजसी क्वार्टर को पूरे महीने प्रकाशित करके मनाया जाता है ।
नवरात्रि उत्सव देवी अंबा (शक्ति) का प्रतिनिधित्व है । वसंत की शुरुआत और #शरद ऋतु की शुरुआत, जलवायु और सूरज के प्रभावों का महत्वपूर्ण संगम माना जाता है । इन दो समय माँ दुर्गा की पूजा के लिए पवित्र अवसर माने जाते है । त्यौहार की तिथियाँ चंद्र कैलेंडर के अनुसार निर्धारित होती हैं । नवरात्रि पर्व, #माँ-दुर्गा की अवधारणा भक्ति और परमात्मा की शक्ति (उदात्त, परम, परम रचनात्मक ऊर्जा) की पूजा का सबसे शुभ और अनोखा अवधि माना जाता है । यह पूजावैदिक युग से पहले, प्रागैतिहासिक काल से है । ऋषि के वैदिक युग के बाद से, नवरात्रि के दौरान की भक्ति प्रथाओं में से मुख्य रूप गायत्री साधना का हैं ।
नवरात्रि के पहले तीन
नवरात्रि के पहले तीन दिन देवी #दुर्गा की पूजा करने के लिए समर्पित किए गए हैं । यह पूजा ऊर्जा और शक्ति की की जाती है । प्रत्येक दिन दुर्गा के एक अलग रूप को समर्पित है। #त्योहार के पहले दिन बालिकाओं की पूजा की जाती है । दूसरे दिन युवती की पूजा की जाती है । तीसरे दिन जो महिला परिपक्वता के चरण में पहुँच गयी है उसकि पूजा की जाती है । देवी दुर्गा के विनाशकारी पहलु सब बुराई प्रवृत्तियों पर विजय प्राप्त करने के प्रतिबद्धता के प्रतीक है।
देवी की आरती
व्यक्ति जब #अहंकार, क्रोध, वासना और अन्य पशु प्रवृत्ति की बुराई प्रवृत्तियों पर विजय प्राप्त कर लेता है, वह एक शून्य का अनुभव करता है। यह शून्य आध्यात्मिक धन से भर जाता है। प्रयोजन के लिए, व्यक्ति सभी भौतिकवादी, आध्यात्मिक धन और समृद्धि प्राप्त करने के लिए देवी लक्ष्मी की पूजा करता है । नवरात्रि के चौथे, पांचवें और छठे दिन लक्ष्मी- समृद्धि और शांति की देवी की पूजा करने के लिए समर्पित है । शायद व्यक्ति बुरी प्रवृत्तियों और धन पर विजय प्राप्त कर लेता है, पर वह अभी सच्चे ज्ञान से वंचित है । ज्ञान एक मानवीय जीवन जीने के लिए आवश्यक है भले हि वह सत्ता और धन के साथ समृद्ध है । इसलिए, नवरात्रि के पांचवें दिन देवी सरस्वती की पूजा की जाती है। सभी पुस्तकों और अन्य साहित्य सामग्रीयो को एक स्थान पर इकट्ठा कर दिया जाता हैं और एक दीया देवी आह्वान और आशीर्वाद लेने के लिए, देवता के सामने जलाया जाता है ।
नवरात्रि का सातवां और आठवां दिन
सातवें दिन, कला और ज्ञान की देवी, #सरस्वती, की पूजा की है। प्रार्थनायें, आध्यात्मिक ज्ञान की तलाश के उद्देश्य के साथ की जाती हैं । आठवे दिन पर एक 'यज्ञ' किया जाता है। यह एक बलिदान है जो देवी दुर्गा को सम्मान तथा उनको विदा करता है।
नवरात्रि का नौवां दिन
नौवा दिन नवरात्रि समारोह का अंतिम दिन है। यह महानवमी के नाम से भी जाना जाता है । ईस दिन पर, कन्या पूजन होता है । उसमे नौ कन्याओं की पूजा होती है जो अभी तक यौवन की अवस्था तक नहीं पहुँची है । इन नौ कन्याओं को देवी दुर्गा के नौ रूपों का प्रतीक माना जाता है । कन्याओं का सम्मान तथा स्वागत करने के लिए उनके पैर धोए जाते हैं। #पूजा के अंत में कन्याओं को उपहार के रूप में नए कपड़े पेश किए जाते हैं ।
नवरात्रि के व्रत में इन बातों का रखना चाहिए ख्याल:
 नवरात्रि में नौ दिन का व्रत रखने वालों को दाढ़ी-मूंछ और बाल नहीं कटवाने चाहिए । इस दौरान बच्चों का मुंडन करवाना शुभ होता है ।
नौ दिनों तक नाखून नहीं काटने चाहिए ।
इस दौरान खाने में प्याज, #लहसुन और नॉन वेज बिल्कुल न खाएं ।
नौ दिन का व्रत रखने वालों को काले कपड़े नहीं पहनने चाहिए ।
व्रत रखने वाले लोगों को बेल्ट, चप्पल-जूते, बैग जैसी चमड़े की चीजों का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए ।
व्रत में नौ दिनों तक खाने में अनाज और नमक का सेवन नहीं करना चाहिए । खाने में कुट्टू का आटा, समारी के चावल, सिंघाड़े का आटा, सेंधा नमक, फल, आलू, मेवे, मूंगफली खा सकते हैं ।
विष्णु पुराण के अनुसार, नवरात्रि व्रत के समय दिन में सोने, तम्बाकू चबाने और शारीरिक संबंध बनाने से भी व्रत का फल नहीं मिलता है ।

यदि कोई पूरे नवरात्र के उपवास न कर सकता हो तो सप्तमी, अष्टमी और नवमी तीन दिन उपवास करके देवी की #पूजा करने से वह नवरात्र के #उपवास के फल को प्राप्त करता है ।
नवरात्र पर जागरण
नवरात्र पर उत्तम जागरण वह है, जिसमें
(1शास्त्र-अनुसार चर्चा हो ।
(2) दीपक हो ।
(3) भक्तिभाव से युक्त माँ का कीर्तन हो ।
(4) वाद्य, ताल आदि से युक्त सात्त्विक संगीत हो ।
(5) प्रसन्नता हो ।
(6)सात्त्विक नृत्य हो, ऐसा नहीं कि डिस्को या अन्य कोई पाश्चात्य नृत्य किया ।
(7) माँ जगदम्बा पर नजर हो, ऐसा नहीं कि किसीको गंदी नजर से देखें ।
(8) मनोरंजन सात्त्विक हो; रस्साकशी, लाठी-खेंच आदि कार्यक्रम हों ।
नवरात्र का व्रत सभी मनुष्यों को नियमित तौर पर करना ही चाहिये । जिससे घर में सुख, शांति, बरकत व मधुरता आती है । #आध्यात्मिकता का प्रादुर्भाव होता है । घर की बाधाएँ व क्लेश दूर होते हैं । अपने जीवन में व्यक्तित्व और चरित्र के निर्माण होता है । आपसी जीवन में प्रेम और समन्वय बढ़ता है ।

Posted By Laxman Swatantra11:00

Friday, 26 August 2016

श्री बाला जी ज्योतिष एवं वास्तु अनुसंधान केंद

अंतर्गत लेख:

श्री बाला जी ज्योतिष एवं वास्तु अनुसंधान केंद


स्वर्ग आश्रम कालोनी जी .टी. बी .नगर दिल्ली 110009 में आप सभी का स्वागत
जन्म कुंडली,लाल किताब उपाय, वास्तु, ,अंक ज्योतिष, हस्तरेखा,रत्न परामर्श, रेकी उपचार ,प्राणिक हीलिंग  के लिये  परामर्श / मार्गदर्शन के लिए संपर्क करें
नोट-  मिलने के लिये फोन पर समय अवश्य ले
रोज सुबह 9-30 बजे से 11- बजे तक सायं 9 बजे से  10- बजे तक
निशुल्क (फ्री / मुफ्त) में सलाह मंगलवार सुबह व सायं 9 बजे से 11 बजे तक
आचार्य लक्ष्मण 
लाल किताब,ज्योतिष एवं वास्तु विशेषज्ञ 
फोन न. 9868765003

Posted By Laxman Swatantra07:55

Thursday, 18 August 2016

यदि किसी कारणवश अपना घर नहीं बनवा पा रहे ? यह उपाय करें


घर या मकान, जहां हम हमारे प्रियजनों के साथ रहते हैं। सभी का सपना होता है कि उनका अपना सुंदर सा घर हो। इस सपने को पूरा करने के लिए कड़ी मेहनत की जाती है लेकिन फिर भी काफी लोग खुद का आशियाना बनाने में सफल नहीं हो पाते। ज्योतिष के अनुसार यदि कुंडली में मंगल या शनि से संबंधित कोई ग्रह दोष हो तो यह सपना पूरा करने में कई परेशानियों का सामना करना पड़ता है।
ज्योतिष शास्त्र में कई ऐसे उपाय बताए गए हैं जिन्हें अपनाने से ऐसे सभी ग्रह दोषों का प्रभाव कम हो जाता है जिनकी वजह से खुद का घर बनाने में कठिनाइयों को झेलना पड़ता है।

यदि किसी कारणवश आप अपना मकान नहीं बनवा पा रहे हैं या नया मकान नहीं खरीद पा रहे है, तो नीम की लकड़ी का एक छोटा सा घर बनवाकर किसी गरीब बच्चे को दान कर दें या किसी मंदिर में रख आएं। ऐसा करने पर शीघ्र ही आपको घर मिलने के योग बनेंगे। 

Posted By Laxman Swatantra03:52

Wednesday, 17 August 2016

1-हनुमान मंदिर, इलाहबाद, (उत्तर प्रदेश)

अंतर्गत लेख:


एक प्राचीन किंवदन्ती के अनुसार प्रयाग (इलाहबाद) का एक नाम इलाबास भी था। जो मनु की पुत्री इला के नाम पर था। प्रयाग के निकट झूसी या प्रतिष्ठानपुर में चन्द्रवंशी राजाओं की राजधानी थी। इसका पहला राजा इला और बुध का पुत्र पुरुरवा एल हुआ। उसी ने अपनी राजधानी को इलाबास की संज्ञा दी जिसका रूपांतर अकबर के समय में इलाहाबाद हो गया। इलाहबाद में सम्राट अकबर ने 1583 में यमुना तट पर किला बनवाया था। किले के अंदर 232 फुट का अशोक स्तम्भ सुरक्षित है।
 मंदिर लेटे हुए हनुमान जी की प्रतिमा
इलाहबाद में गंगा, यमुना, सरस्वती तीन भव्य नदियों का संगम होता है इसलिए भारत के प्रमुख पवित्र स्थानों में इलाहाबाद प्रमुख है। प्रयाग के नाम से यह स्थान प्रसिद्ध है। इस स्थान पर बारह सालों में एक बार कुंभ का मेला आयोजित होता है। आस्था शिक्षा एवं संस्कृति से ओत-प्रोत इस नगरी में प्रति वर्ष माघ मेले का आयोजन होता है।
जनश्रुति के अनुसार इलाहाबाद में एक अनोखा हनुमान मंदिर है । यह भव्य मंदिर यह मंदिर इलाहाबाद किला के पास गंगा नदी के किनारे पर है। जिसका विवरण पुराणों में विस्तारित रूप में मिलता है। रेलवे स्टेशन के पास शहर के बीचों-बीच स्थित यह मंदिर साल भर खुला रहता है और यहां काफी संख्या में तीर्थयात्री पूजा-अर्चना करने आते हैं। ऐसी मान्यता है कि यहाँ दर्शनकर भक्तों की मनोकामनाएँ पू्र्ण होती हैं। हनुमान की यहां स्थापित अनूठी प्रतिमा को “प्रयाग का कोतवाल” होने का दर्जा भी हासिल है। आम तौर पर जहां दूसरे मंदिरों मे प्रतिमाएँ सीधी खड़ी होती हैं। वही इस मन्दिर मे लेटे हुए बजरंग बली की पूजा होती है।

उत्तर प्रदेश के प्रसिद्ध तीर्थस्थल इलाहाबाद के इस हनुमान मंदिर में हनुमान सोई हुई अवस्था में हैं। यह मंदिर लेटे हुए हनुमान जी की प्रतिमा वाला यद्यपि एक छोटा किन्तु प्राचीन मंदिर है।
इस मंदिर का निर्माण 1787 में किया गया था। सम्पूर्ण भारत का केवल यह एकमात्र मंदिर है, जिसमें हनुमान जी लेटी हुई (सोई हुई अवस्था) मुद्रा में हैं। यहां पर स्थापित हनुमान जी की प्रतिमा 20 फीट लम्बी है। जनश्रुति के अनुसार हनुमान जी के पैर के नीचे देवी कामदा और अहिरावण दबा हुआ है। प्रतिमा जहाँ पर स्थित है वह स्थान सामान्य धरातल से लगभग 8-10 फीट नीचे है। मन्दिर की देखभाल बाघम्बरी गद्दी मठ द्वारा किया जाता है। हनुमान जी के इस स्थान को “बंधवा के बड़े हनुमान जी” भी जाता है।    
जब वर्षा के दिनों में बाढ़ आती है और यह सारा स्थान जलमग्न हो जाता है, तथा हर वर्ष गंगा मैया खुद उन्हें स्नान कराती हैं। कुल मिलाकर ये अनूठा संगम है। तब हनुमानजी की इस मूर्ति को कहीं ओर ले जाकर सुरक्षित रखा जाता है। उपयुक्त समय आने पर इस प्रतिमा को पुन: यहीं लाया जाता है।गुजरते समय के साथ कई बार इस मंदिर का नवीनीकरण किया गया। आखिरी बार 1940 में इस मंदिर में सुधार कार्य किए गए थे।
ऐसी मान्यता है कि संगम का पूरा पुण्य हनुमान जी के इस दर्शन के बाद ही पूरा होता है।
इस मान्यता के पीछे रामभक्त हनुमान के पुनर्जन्म की कथा जुड़ी हुई है।
पौराणिक कथाओं के मुताबिक लंका विजय के बाद भगवान् राम जब संगम स्नान कर भारद्वाज ऋषि से आशीर्वाद लेने प्रयाग आए तो उनके सबसे प्रिया भक्त हनुमान इसी जगह पर शारीरिक कष्ट से पीड़ित होकर मूर्छित हो गए, और अपार कष्ट से पीड़ित होकर मरणा सन्न अवस्था मे पहुँच गए थे। पवन पुत्र को मरणासन्न देख माँ जानकी ने उन्हें अपनी सुहाग के प्रतिक सिन्दूर से नई जिंदगी दी और हमेश स्वस्थ एवं आरोअग्य रहने का आशीर्वाद प्रदान किया, व आशीर्वाद देते हुए कहा कि जो भी इस त्रिवेणी तट पर संगम स्नान पर आयेंगा उस को संगम स्नान का असली फल तभी मिलेगा जब वह हनुमान जी के दर्शन करेगा। माँ जानकी द्वारा सिन्दूर से जीवन देने की वजह से ही बजरंग बली को सिन्दूर चढाये जाने की परम्परा है।
संगम आने वाल हर एक श्रद्धालु यहां सिंदूर चढ़ाने और हनुमान जी के दर्शन को जरुर पहुंचता है। बजरंग बली के लेटे हुए मन्दिर मे पूजा-अर्चना के लिए यूं तो हर रोज़ ही देश के कोने-कोने से हजारों भक्त आते हैं लेकिन मंदिर के महंत आनंद गिरी महाराज के अनुसार राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के साथ साथ पंडित नेहरू, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, सरदार बल्लब भाई पटेल और चन्द्र शेखर आज़ाद जैसे तमाम विभूतियों ने अपने सर को यहां झुकाया, पूजन किया और अपने लिए और अपने देश के लिए मनोकामन मांगी। यह कहा जाता है कि यहां मांगी गई मनोकामना अक्सर पूरी होती है।
 आरोग्य व अन्य कामनाओं के पूरा होने पर हर मंगलवार और शनिवार को यहां मन्नत पूरी होने का झंडा निशान चढ़ने के लिए लोग जुलूस की शक्ल मे गाजे-बाजे के साथ आते हैं। मन्दिर में कदम रखते ही श्रद्धालुओं को अजीब सी सुखद अनुभूति होती है। भक्तों का मानना है कि ऐसे प्रतिमा पूरे विश्व मे कहीं मौजूद नहीं है।
 हनुमान जी की इस प्रतिमा के बारे मे कहा जाता है, कि 1400 इसवी में जब भारत में औरंगजेब का शासन काल था तब उसने इस प्रतिमा को यहां से हटाने का प्रयास किया था। करीब 100 सैनिकों को इस प्रतिमा को यहां स्तिथ किले के पास के मन्दिर से हटाने के काम मे लगा दिया था। कई दिनों तक प्रयास करने के बाद भी प्रतिमा टस से मस न हो सकी। सैनिक गंभीर बिमारी से ग्रस्त हो गये। मज़बूरी में औरंगजेब को प्रतिमा को वहीं छोड़ दिया।
 इलाहबाद किले के पास इसके अलावा अन्य मूर्तियां भी यहां प्रतिष्ठापित है- 
“पातालपुरी मंदिर” की मान्यता है कि किले के भूगर्भ में भगवान राम चित्रकूट-गमन के समय इस स्थान पर आए थे। मनकामेश्वर मंदिर यह मंदिर अन्य शिवालयों में से प्रमुख हैं।
“अलोपीदेवी मंदिर” में प्रत्येक सोमवार एवं शुक्रवार के दिन असंख्य श्रद्धालु आते हैं।नवरात्रि के दिनों में देवी की पूजा-अर्चना होती है। इस प्रसिद्ध भव्य मंदिर में एक शक्तिपीठ में एक कुण्ड एवं ऊपर एक झूला पूजित होता है।नवरात्रि के समय असंख्य श्रद्धालु इस मंदिर में एकत्रित होते हैं।
“हनुमत निकेतन” इस मंदिर में मुख्य मूर्ति हनुमानजी की है, दक्षिण भाग में श्रीराम, लक्ष्मण और जानकी की मूर्तियाँ हैं तथा उत्तर भाग में गुत्रगा की प्रतिमा स्थित है।कल्याणीदेवी मंदिर प्रयाग में स्थित यह मंदिर एक प्रसिद्ध शक्तिपीठ है। मंदिर में तीन मुख्य मूर्तियाँ हैं। कल्याणी देवी के बाएँ तरफ छिन्नमस्ता देवी की मूर्ति है और दाएँ तरफ शंकर-पार्वती की मूर्तियाँ हैं।

Posted By Laxman Swatantra05:23

ज्योतिष के सच

अंतर्गत लेख:


1. कभी भी उच्च के ग्रहों का दान नहीं करना चाहिए और नीच ग्रहों की कभी पूजा नहीं करनी चाहिए।
2 . कुंडली में गुरु दशम भाव में हो या चौथे भाव में हो तो मंदिर निर्माण के लिए धन नहीं देना चाहिए यह अशुभ होता है और जातक को कभी भी फांसी तक पहुंचा सकता है। 
3. कुंडली के सप्तम भाव में गुरु हो तो कभी भी पीले वस्त्र दान नहीं करने चाहिए।
4 . बारहवें भाव में चन्द्र हो तो साधुओं का संग करना बहुत अशुभ होगा। इससे परिवार की वृद्धि रुक सकती है। 5 . सप्तम/अष्टम सूर्य हो तो ताम्बे का दान नहीं देना चाहिए, धन की हानि होने लगेगी।
6. मंत्रोच्चारण के लिए दीक्षा लेनी चाहिए क्योंकि अशुद्ध उच्चारण से लाभ की बजाय हानि अधिक होती है।
7. जब भी मंत्र का जाप करें उसे पूर्ण संख्या में करना जरूरी है।
8. मंत्र एक ही आसन पर, एक ही समय में सम संख्या में करना चाहिए। 
9 . मंत्र जाप पूर्ण होने के बाद दशांश हवन अवश्य करना चाहिए तभी पूर्ण फल मिलता है। 
10. कुछ लोग वार के अनुसार वस्त्र पहनते हैं, यह हर किसी के लिए सही नहीं होता है। कुंडली में जो ग्रह अच्छे हैं उनके वस्त्र पहनना शुभ है लेकिन जो ग्रह शुभ नहीं हैं उनके रंग के वस्त्र पहनना गलत हो सकता है।
11. कई बार किसी से सलाह लिए बिना कुछ लोग मोती पहन लेते हैं, यह गलत है अगरकुंडली में चन्द्रमा नीच का है तो मोती पहनने से व्यक्ति अवसाद में आ सकता है। 
12. अक्सर देखा गया है कि किसी की शादी नहीं हो रही है तो ज्योतिषी बिना कुंडली देखे पुखराज पहनने की सलाह दे देते हैं इसका उल्टा प्रभाव होता है और शादी ही नहीं होती।
13. कुंडली में गुरु नीच का, अशुभ प्रभाव में, अशुभ भाव में हो तो पुखराज कभी भी नहीं पहनना चाहिए।
14. कई लोग घर में मनी प्लांट लगा लेते हैं यह सुनकर कि इससे घर में धन वृद्धि होगी लेकिन तथ्य तो यह है कि अगर बुध खराब हो तो घर में मनी प्लांट लगाने से घर की बहन-बेटी दुखी रहती हैं। 
15. कैक्टस या कांटे वाले पौधे घर में लगाने से शनि प्रबल हो जाता है अतः जिनकी कुंडली में शनि खराब हो उन्हें ऐसे पौधे नहीं लगाने चाहिए। 

Posted By Laxman Swatantra05:18

सर्वप्रथम किसने बांधी राखी किस को और क्यों ??


लक्ष्मी जी ने सर्वप्रथम बलि को बांधी थी। ये बात हैं जब की जब दानबेन्द्र राजा बलि अश्वमेध यज्ञ करा रहें थे तब नारायण ने राजा बलि को छलने के लिये वामन अवतार लिया और तीन पग में सब कुछ ले लिया तब उसे भगवान ने पाताल लोक का राज्य रहने के लिये दें दिया तब उसने प्रभु से कहा की कोई बात नहीँ मैं रहने के लिये तैयार हूँ पर मेरी भी एक शर्त होगी भगवान अपने भक्तो की बात कभी टाल नहीँ सकते उन्होने कहा ऐसे नहीँ प्रभु आप छलिया हो पहले मुझे वचन दें की जो मांगूँगा वो आप दोगे नारायण ने कहा दूँगा दूँगा दूँगा जब त्रिबाचा करा लिया तब बोले बलि
की मैं जब सोने जाऊँ तो जब उठूं तो जिधर भी नजर जाये उधर आपको ही देखूं नारायण ने अपना माथा ठोका और बोले इसने तो मुझे पहरेदार बना दिया हैं ये सबकुछ हार के भी जीत गया है
पर कर भी क्या सकते थे वचन जो दें चुके थे ऐसे होते होते काफी समय बीत गया उधर बैकुंठ में लक्ष्मी जी को चिंता होने लगी नारायण के बिना उधर नारद जी का आना हुआ
लक्ष्मी जी ने कहा नारद जी आप तो तीनों लोकों में घूमते हैं क्या नारायण को कहीँ देखा आपने
तब नारद जी बोले की पाताल लोक में हैं राजा बलि की पहरेदार बने हुये हैं तब लक्ष्मी जी ने कहा मुझे आप ही राह दिखाये की कैसे मिलेंगे तब नारद ने कहा आप राजा बलि को भाई बना लो और रक्षा का वचन लो और पहले तिर्बाचा करा लेना दक्षिणा में जो मांगुगी वो देंगे और दक्षिणा में अपने नारायण को माँग लेना लक्ष्मी जी सुन्दर स्त्री के भेष में रोते हुये पहुँची बलि ने कहा क्यों रो रहीं हैं आप तब लक्ष्मी जी बोली की मेरा कोई भाई नहीँ हैं इसलिए मैं दुखी हूँ तब बलि बोले की तुम मेरी धरम की बहिन बन जाओ तब लक्ष्मी ने तिर्बाचा कराया और बोली मुझे आपका ये पहरेदार चाहिये
जब ये माँगा तो बलि पीटने लगे अपना माथा और सोचा धन्य हो माता पति आये सब कुछ लें गये और ये महारानी ऐसी आयीं की उन्हे भी लें गयीं तब से ये रक्षाबन्धन शुरू हुआ था और इसी लिये जब कलावा बाँधते समय मंत्र बोला जाता हैं 
येन बद्धो राजा बलि दानबेन्द्रो महाबला तेन त्वाम  प्रपद्यये रक्षे माचल माचल:
ये मंत्र हैं
रक्षा बन्धन अर्थात बह बन्धन जो हमें सुरक्षा प्रदान करे सुरक्षा किस से हमारे आंतरिक और बाहरी शत्रुओं से रोग ऋण से।राखी का मान करे। अपनी भाई बहन के प्रति प्रेम और सम्मान की भावना रखे। फैशन ना बनाये।

Posted By Laxman Swatantra04:35

भाई - बहन के पवित्र प्रेम के प्रतीक का उत्सव रक्षाबंधन 18 अगस्त को


श्रावण मास की पूर्णिमा को मनाये जाने वाला रक्षाबंधन का पर्व भाई-बहन के प्रेम का अनुपम उदाहरण है. इस बार यह त्योहार 18 अगस्त, दिन गुरुवार को है. बहनों को इस पर्व का बड़ी ही बेसब्री से इंतजार रहता है. जब बहनें अपने भाइयों की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधती है तो वे यह कामना करती हैं कि उसके भाई के जीवन में कभी कोई कष्ट न हो, वह उन्नति करें और उसका जीवन सुखमय हो. वहीं भाई भी इस रक्षा सूत्र को बंधवाकर गौरवांवित अनुभव करते हैं और जीवन भर अपनी बहन की रक्षा करने की कसम खाते है. भाई बहन मे परस्पर स्नेह व प्यार इस पर्व की गरिमा को और बढ़ा देता है.

इस बार रक्षाबंधन के शुभ मुहूर्त -
🌹 प्रथम मुहूर्त 6.00 a.m. से 07.30 a.m. तक

🌹 द्वितीय मुहूर्त 10.30 a.m. से दोपहर 12.00 p.m. तक

🌹 तृतीय मुहूर्त 12.00 p.m. से 01.30 p.m. तक

🌹 चतुर्थ मुहूर्त 01.30 p.m. से 3.00 p.m. तक

🌹 पंचम मुहूर्त 4.30 p.m. से 6.00 p.m. तक

🌹 षष्टम मुहूर्त 6.00 p.m. से 7.30 p.m. तक.
 🌹  विशेष   🌹
पूजा की थाली में ये 7 चीजें अनिवार्य रूप से होनी चाहिए
इस दिन सभी बहनें अपने भाइयों की कलाई पर राखी बांधने से पहले एक विशेष थाली सजाती है. इस थाली में 7 खास चीजें होनी चाहिए.
  1. कुमकुम
 2. चावल
 3. नारियल
 4. रक्षा सूत्र (राखी)
 5. मिठाई
 7. गंगाजल से भरा कलश
पूजा की थाली में क्यो रखना चाहिए ये खास 7 चीजें -
1. कुमकुम -
तिलक मान-सम्मान का भी प्रतीक है. बहन कुमकुम का तिलक लगाकर भाई के प्रति सम्मान प्रकट करती है तथा भाई की लंबी उम्र की कामना भी करती है. इसलिए थाली में कुमकुम विशेष रूप से रखना चाहिए.
2. चावल -
चावल शुक्र ग्रह से भी संबंधित है. शुक्र ग्रह के प्रभाव से ही जीवन में भौतिक सुख-सुविधाओं की प्राप्ति होती है. तिलक लगाने बाद तिलक के ऊपर चावल भी लगाए जाते हैं. तिलक के ऊपर चावल लगाने का भाव यह है कि भाई के जीवन पर तिलक का शुभ असर हमेशा बना रहे. तथा भाई को समस्त भौतिक सुख-सुविधाएं प्राप्त हों.
3. नारियल -
बहन अपने भाई को तिलक लगाने के बाद हाथ में नारियल देती है. नारियल को श्रीफल भी कहा जाता है. श्री यानी देवी लक्ष्मी का फल. यह सुख - समृद्धि का प्रतीक है. बहन भाई को नारियल देकर यह कामना करती है कि भाई के जीवन में सुख और समृद्धि हमेशा बनी रहे और वह लगातार उन्नति करता रहे. यह नारियल भाई को वर्षपर्यंत अपने घर मे रखना चाहिए.
4. रक्षा सूत्र (राखी) -
बहन राखी बांधकर अपने भाई से उम्र भर रक्षा करने का वचन लेती हैं. भाई को भी ये रक्षा सूत्र इस बात का अहसास करवाता रहता है कि उसे हमेशा बहन की रक्षा करनी है. रक्षा सूत्र का अर्थ है, वह सूत्र (धागा) जो हमारे शरीर की रक्षा करता है. रक्षा सूत्र बांधने से त्रिदोष शांत होते हैं. त्रिदोष यानी वात, पित्त और कफ. हमारे शरीर में कोई भी बीमारी इन दोषों से ही संबंधित होती है. रक्षा सूत्र कलाई पर बांधने से शरीर में इन तीनों का संतुलन बना रहता है. ये धागा बांधने से कलाई की नसों पर दबाव बनता है, जिससे ये तीनों दोष निंयत्रित रहते हैं.
5. मिठाई -
राखी बांधने के बाद बहन अपने भाई को मिठाई खिलाकर उसका मुंह मीठा करती है.  मिठाई खिलाना इस बात का प्रतीक है कि बहन और भाई के रिश्ते में कभी कड़वाहट न आए, मिठाई की तरह यह मिठास हमेशा बनी रहे.
6. दीपक -
राखी बांधने के बाद बहन दीपक जलाकर भाई की आरती भी उतारती है. इस संबंध में मान्यता है कि आरती उतारने से सभी प्रकार की बुरी नजरों से भाई की रक्षा हो जाती है. आरती उतारकर बहन कामना करती है कि भाई हमेशा स्वस्थ और सुखी रहे.
7. गंगाजल से भरा कलश -
राखी की थाली में गंगा!जल से भरा हुआ एक कलश भी रखा जाता है. इसी जल को कुमकुम में मिलाकर तिलक लगाया जाता है. हर शुभ काम की शुरुआत में जल से भरा कलश रखा जाता है. ऐसी मान्यता है कि इसी कलश में सभी पवित्र तीर्थों और देवी-देवताओं का वास होता है. इस कलश की प्रभाव से भाई और बहन के जीवन में सुख और स्नेह सदैव बना रहता है.
रक्षाबंधन के अवसर पर वैदिक राखी बाँधें
इस राखी को बनाने मे 5 वस्तुओं की आवश्यकता होती है ।
1. दूब (घास)
2. अक्षत (चावल)
3. केसर
4. चन्दन
5. पीली सरसों के दाने
इन पाँचों वस्तुओं को रेशम के कपडे में बाँध दें या सिलाई कर दें . फिर उसे कलावा में पिरो दें , इस प्रकार आपकी वैदिक राखी तैयार होती है .
वैदिक राखी में प्रयुक्त चीजो का महत्व -
1. दूब
2. अक्षत
3. केसर
4.  चंदन
5. पीली सरसों के दाने
1. दूब -
🌹🌹🌹

राखी मे दूब की अवधारणा यह है कि जिस प्रकार दूब का अंकुर बो देने पर तेजी से फैलता है और हजारों की संख्या में उग जाता है. उसी प्रकार भाई का वंश और उसके सद्गगुणों का विकास हो. सदाचार मन की पवित्रता तेजी से बढती जाये.

2. अक्षत -
राखी मे अक्षत की अवधारणा यह है कि हमारी भाई के प्रति श्रद्धा कभी क्षत - विक्षत न हो. सदैव बनी रहे.
3. केसर -
राखी मे केसर की अवधारणा यह है कि  जिस प्रकार केसर की प्रकृति तेज होती है उसी प्रकार हमारा भाई भी तेजस्वी हो. उसके जीवन में आध्यात्मिकता एवं भक्ति का तेज कभी भी कम न हो.
4.  चंदन -
राखी मे चंदन की अवधारणा यह है कि चंदन सुगंध और शीतलता देता है उसी प्रकार भाई के जीवन में कभी मानसिक तनाव न हो. उसका जीवन सुगंध और शीतलता से ओतप्रोत हो.
5. पीली सरसों के दाने -
राखी मे पीली सरसों के दाने की अवधारणा यह है कि जिस प्रकार सरसों की प्रकृति तीक्ष्ण होती है उसी प्रकार उसका भाई समाज के दुर्गुणों एवं बुराइयों को समाप्त करने में तीक्ष्ण बने.
वैदिक राखी बाँधने की विधि -
पांच वस्तुओं से बनी हुई एक राखी को सर्वप्रथम अपने ईष्ट के चित्र पर अर्पित करनी चाहिए. फिर बहनें अपने भाई को, माता अपने बच्चों को, दादी अपने पोते को शुभ संकल्प करके बांधे.
 राखी बांधते समय यह श्लोक बोलें –
''येन बद्धो बलिःराजा दानवेन्द्रो महाबलः ।
तेन त्वामनुबध्नामि रक्षे मा चल मा चलः ||

Posted By Laxman Swatantra04:29

Sunday, 17 July 2016

नक्षत्रानुसार जातक पर पड़ने फल

अंतर्गत लेख:


जातक पर नक्षत्र का बहुत प्रभाव पड़ता है | अतः नक्षत्रानुसार जातक पर पड़ने वाला प्रभाव आगे दिया गया है |

1-अश्विनी – विचारशील, अध्ययन, अध्यापन करने वाला, ज्योतिष, वैद्यक आदि शास्त्रों में रूचि रखने वाला, लेखक, ईमानदार, चंचल प्रकृति, मस्से का रोगी और गृह – कलह प्रिय |
2-भरणी – बलवान, शत्रुओं पर अचानक आक्रमण करने वाला, चालाक, धार्मिक कार्यो में रूचि रखने वाला, चित्रकार, धोखेबाज, निम्न स्तर के कार्य करने वाला तथा उन्नति का आकांक्षी |
3-कृत्तिका – विध्याभिलाषी, पशु प्रेमी, अस्वस्थ्य, भोगी, साधक, साधू संतों में आस्था रखने वाला, कलहप्रिय,निर्धन से धनवान होने वाला, लड़ाई-झगड़ों में रूचि रखने वाला, वकील एवं कट्टर धार्मिक |
4-रोहिणी – स्वच्छता प्रिय, असत्यवादी, संगीत में रूचि रखने वाला, सामजिक कार्यकर्त्ता, प्रसन्नचित्त, भूत-प्रेतों में विश्वास करने वाला, प्रतिष्ठा का इच्छुक, ईमानदार व् सत्यभाषियों का हित सम्पादन करने वाला |
5-मृगशिरा – धनवान, अनैतिक कार्यों से धन इकठ्ठा करने वाला, अविश्वासी, उन्नतिगामी, सट्टा-जुआ आदि में रूचि रखने वाला, व्यापारी, अधिकारी, कार्यों में निपुण, विचारशील, प्रगतिशील, धार्मिक और यदा कदा उत्सवों में झूठा आडम्बर तथा शान-शौकत दिखाने वाला |
7-आर्द्रा – मधुरभाषी, सबसे प्रेमपूर्वक व्यवहार करने वाला, साधारण आर्थिक स्थिति युक्त,अपमानजनक कार्य करने वाला, अदूरदर्शी, कुटुम्बियों से कलह करने वाला, ओछा तथा घुमक्कड़ी |
8-पुनर्वसु – विचारपूर्वक कार्य करने वाला, शिक्षक तथा मेधावी, दंतरोग से पीड़ित, ससुराल से धन प्राप्त करने वाला, वृद्धावस्था में सुखी, स्वच्छ वस्त्रों का इच्छुक, क्रोधी, अभिमानी, उच्चाभिलाषी, उत्तम तथा महत्वपूर्ण पद प्राप्त करने वाला, व्यभिचारी तथा आलसी और हाथ पैरों की पीड़ा से ग्रस्त |
9-पुष्य – अस्वस्थ्य, कार्यों को चतुरतापूर्वक निबटाने वाला, शिव भक्त, मशीनरी, की वस्तुओं से लाभ पाने वाला, बात बेबात मित्रों से विरोध करने वाला, व्यापारिक बुद्धि वाला, सम्बन्धियों से प्रेम करने वाला, मानसिक चिंता से ग्रस्त, साधारण आर्थिक स्थिति वाला तथा मुंह पर स्पष्ट कहने वाला |
10-आश्लेषा – धनवान, स्त्री प्रेमी, काम-शक्ति में कमजोर, स्वार्थी, दूसरों का कार्य करने में तत्पर, खाने पीने में रूचि रखने वाला, अकस्मात् आहत करने वाला,  कभी कभी चोरी करने वाला, आलसी, छोटे व्यक्ति से मित्रता करने वाला, स्त्री के कष्ट से पीड़ित, हंसमुख और सत्यवक्ता |
11-मघा – गुप्त कार्यों में रूचि रखने वाला, क्रोधी, अकस्मात् हानि उठाने वाला, कर्णरोगी, तेज आवाज वाला, प्रबल कामी, दूसोर्ण के धन पर अधिकार रखने वाला, उन्नति में बार बार बाधाओं का सामना करने वाला, अप्रसन्नचित, चर्म रोग से पीड़ित, चिंताग्रस्त और अल्प वेतनभोगी |
12-पूर्वाफाल्गुनी – शस्त्र चलाने में निपुण, पशु-प्रेमी, व्यापारिक कार्यों में रूचि रखने वाला, धार्मिक संस्थाओं में कार्य करने वाला, क्रय विक्रय में हानि उठाने वाला, उन्नति के कार्यों में असफल, मान-सम्मान की इच्छा रखने वाला, इन्द्रिय सम्बन्धी रोगों से ग्रसित, स्वधर्म में अश्रद्धायुक्त, सर पर चोट का निशान रखने वाला, परेशान और हिम्मतवाला |
13-उत्तराफाल्गुनी – प्रियभाषी, कार्य-कुशल, अल्प द्रव्य वाला, थोड़े में निर्वाह करने वाला, एकांतप्रेमी, पशुओं में श्रद्धा रखने वाला, मातृ पितृ सुख से वंचित, तीक्ष्ण स्मरण शक्ति वाला, कलाकुशल और सम्बन्धियों से प्रेम व्यवहार करने वाला |
14-हस्त – मक्कार, कपटप्रिय, असत्यभाषी, अभिमानी, परिश्रमी, माता पिता के कष्ट से पीड़ित, लापरवाह, गायन प्रेमी, लम्बे डील डोल वाला, परिश्रम से उन्नति करने वाला, जलप्रेमी तथा पशु आदि पालकर निर्वाह करने वाला |
15-चित्रा – कर्ण तथा नेत्ररोगी, अद्भुत कार्य करने वाला, साधारण सी बात पर क्रोध करने वाला, नायक के कार्य में निपुण, शारीरिक बल बढाने में प्रयत्नशील, गरीब, विद्याभ्यास का इच्छुक, अनुभवी, शत्रुओं का सामना करने वाला तथा ईमानदार |
16-स्वाति – वीर, नेता, स्वप्नों में जीवित रहने वाला, भाग्यशाली, क्रोधावेश में खुद की और घर की हानि करने वाला, स्वतन्त्र विचार वाला, उन्नति में बाधा का शिकार, अपनी बात पर हठपूर्वक अड़ने वाला, चतुराई से काम निकालने वाला, पुष्ट शरीर, तीव्र विचार शक्ति और शरीर में चोट पाने वाला |
17-विशाखा – विदेशी भ्रमणकारी, चित्रकार, सच्चाई का इच्छुक, लड़ाई करने में कुशल, विचारहीन, चतुर, व्यापारिक कार्यों में रूचि रखने वाला, दूसरों को अच्छी सलाह देने वाला, भाषण देने में चतुर, उन्नतिशील तथा ज्योतिष आदि में विश्वास रखने वाला |
18-अनुराधा – उच्च विचार वाला, ईमानदारी से कार्य करने वाला, स्वधर्म प्रेमी, नए विचारों का स्वागत करने वाले, दर्शन, वेद और ज्योतिष में तीव्र रुचि रखने वाला, सम्मान पाने वाला, पितृ सुख से वंचित, काम निकालने में चतुर, कला निपुण, पढने में परिश्रमी, बचपन से दुःख उठाने वाला, उन्नतिशील, दूसरों की बातों को समझने वाला और उनको समझाने वाला, उच्च कोटि का कार्यकर्ता तथा संगीत में रूचि रखने वाला |
19-ज्येष्ठा – अच्छा लेखक, अभिमानी, विलासी, भाइयों से हानि उठानी वाला, बोलने में तेज, अस्वस्थ्य, आलसी स्वभाव, पशु पालन, मित्रों पर अंध श्रद्धा रखने वाला, उन्नति के कार्य में विघ्न बाधा पाने वाला, स्वकुल विरोधी तथा उन्नतिशील |
20-मूल – अपनी इच्छानुसार कार्य करने वाला, पुरानी पीढ़ी से विद्रोह करने वाला, पिता को  कष्टकारी, उदररोगी, दूसरों की बात न मानने वाला, घुमक्कड़ जीवन बिताने वाला, जादू टोने और तांत्रिक विद्या में निपुण, औषधियों के क्रय विक्रय से लाभ उठाने वाला, वस्त्रालंकार प्रेमी, शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने वाला, पढने की तीव्र इच्छा रखने वाला, स्वच्छता प्रेमी, बुढापे में कष्ट उठाने वाला एवं पढ़ाई में उन्नति करने वाला |
21-पूर्वाषाढ़ – दूसरों से सम्मान प्राप्त करने वाला, बचपन में दुखी परन्तु मध्यमावस्था में सुखी, शान्तिभोगी, प्रबल कामी, अनेक स्त्रियों से संसर्ग रखने वाला, एकान्तप्रिय, दुर्बल शरीर, गायन कला में निपुण, स्त्रियों से धन प्राप्त करने वाला, अल्पायु में पिता कष्ट से पीड़ित, मानसिक रोगी, अनेक चिंताओं से ग्रसित, कार्यकुशल तथा शीघ्र सफलता प्राप्त करने वाला |
22-उत्तराषाढ़ – चित्रकला में निपुण, स्वच्छ वस्त्रों का शौक़ीन, मान-प्रतिष्ठा प्राप्त करने वाला, भाषण कला में निपुण, पुष्ट शरीर, श्रेष्ठ बुद्धि, अल्पायु, अभिमानी, असत्यभाषी, रुक रुक कर बात करने वाला, व्यापारिक कार्यों से लाभ उठाने वाला, गृहकार्यों में निपुण, तीव्र बुद्धि वाला, इच्छाशक्ति और भविष्य के लिए सुख सुविधा जुटाने वाला |
23-श्रवण – चंचल स्वभाव, मातृ-पितृ भक्त, अभिमानी, जल सम्बन्धी कार्यों में रूचि रखने वाला, सोच विचार कर कार्य करने वाला, मित्र विरोधी, खाने पीने की वस्तुओं का शौक रखने वाला, अस्वस्थ्य, व्यापार एवं क्रय विक्रय से लाभ उठाने वाला, भूमि कार्यों में निपुण, धनवान व् धार्मिक कार्यों में उत्साह रखने वाला |
24-धनिष्ठा – अदूरदर्शी, उन्नति के कार्यों में बाधा पाने वाला, युद्ध कार्यों से प्रेम करने वाला, गरीब, श्रम से ऊंचा उठने वाला,  स्त्री प्रेमी, ईमानदार, स्वच्छ वस्त्रधारी, क्रोधी, अभिमानी, उन्नति की आकांक्षा रखने वाला, लोहे के कार्य में हानि उठाने वाला तथा मार-पीट में नुक्सान उठाने वाला |
25-शतभिषा – सेवाभावी, स्वच्छ, पवित्र कार्य करने वाला, धार्मिक, चंचल स्वभाव, बिना सोच समझकर कार्य करने वाला, यदा कदा किये गए कार्यों में हानि उठाने वाला, मशीनरी के कार्यों में रूचि रखने वाला, उच्च विचार एवं सात्विक जीवन बिताने वाला, बुद्धिमान, सदाचारी, साधु संतो का प्रेमी तथा कट्टर धार्मिक |
26-पूर्वाभाद्रपद – ईश्वरभक्त, स्त्रियों से संकोच करने वाला, आरामपसंद, पुजारी, कार्य में अनायास सफलता प्राप्त करने वाला, यात्रा प्रिय, कवि, चतुरतापूर्वक कार्य करने वाला, स्वस्थ्य, बच्चो का प्रेमी और शिक्षण कार्यों में रूचि रखने वाला |
27-उत्तराभाद्रपद – प्रसन्नचित्त, उन्नतिशील, स्त्रियों से विशेष सम्मान पाने वाला, उदारचरित्र, मुक्तहस्त, भावुक, सोच-विचार से काम करने वाला, अकस्मात् हानि का शिकार, शत्रुओं से दुखी, आलसी, विद्या प्रेमी, उच्च सत्कुलीन, राजकर्मियों का मित्र |
28-रेवती – विद्याप्रेमी, सरल स्वभाव, विनम्र, तीर्थयात्री, बुद्धि से काम न करने वाला, प्रसन्नचित्त, गरीब, एकान्तप्रिय, ईश्वरभक्त, उन्नति के कार्यों में रुकावट पाने वाला, आध्यात्मिक शक्ति से संपन्न, सोच विचार न करने वाला और मित्रों से लाभ उठाने वाला |

Posted By Laxman Swatantra08:51

 
भाषा बदलें
हिन्दी टाइपिंग नीचे दिए गए बक्से में अंग्रेज़ी में टाइप करें। आपके “स्पेस” दबाते ही शब्द अंग्रेज़ी से हिन्दी में अपने-आप बदलते जाएंगे। उदाहरण:"भारत" लिखने के लिए "bhaarat" टाइप करें और स्पेस दबाएँ।
भाषा बदलें