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Sunday, 14 August 2022

नपुंसक योग" तो आइए जानते हैं के नपुंसक योग क्या है राशि के अनुसार जानें कैसे पुरुष हो जाते हैं नपुंसक



                                                          नपुंसक योग 



नपुंसकता की बात करें तो यह एक ऐसी बीमारी है जिसमें यह शारीरिक कमजोरी किसी मानसिक कारक के कारण आती है। उदाहरण के लिए, यदि किसी व्यक्ति के अंदर किसी चीज को लेकर संघर्ष चल रहा है, या बहुत अधिक तनाव लेने के कारण, पुरुषों में नपुंसकता भी एक बुरा यंकी नपुंसकता पैदा कर सकती है। यद्यपि इस बीमारी को दो स्थितियों में विभाजित किया जा सकता है।जब दो या दो से अधिक ग्रहों का परस्पर संबंध बनता है उसे योग कहा जाता है और जैसा कि हम जानते हैं कि ज्योतिष में अनेकों  योग बनते हैं। इसी श्रृंखला  में आज हम जन्म कुंडली में बनने वाली एक विशेष योग की चर्चा करने जा रहे हैं जिसका नाम है" नपुंसक योग" तो आइए जानते हैं के नपुंसक योग क्या है? और यह कैसे बनता है? तथा इसके क्या दुष्परिणाम है?व उन दुष्परिणामों को किस प्रकार से दूर किया जा सकता है?

इस बीमारी में, ऐसी स्थिति होती है जब किसी पुरुष के शुक्राणु में शुक्राणु की कमी होती है, या उसके वीर्य में कोई शुक्राणु नहीं होता है, इस स्थिति में वह पुरुष बच्चा पैदा करने में असमर्थ होता है, अर्थात उसके पास बच्चे पैदा करने की क्षमता नहीं होती है।, भले ही वह अपने जीवनसाथी को रति के खेल में बहुत संतुष्ट करने में सक्षम हो, लेकिन एक आदमी में पिता नहीं बनने की स्थिति को नपुंसकता कहा जाता है। दूसरी स्थिति में, एक पुरुष के जननांग में उत्तेजना नहीं होती है जो नामर्दी से ग्रस्त है, या यदि वह कभी-कभी आता है, तो यह बहुत जल्दी समाप्त हो जाता है, जिसके कारण पुरुष अपने जीवन साथी या जो भी वह संबंध स्थापित कर रहा है, उससे संतुष्ट होता है पुरुषों की यह स्थिति जो ऐसा करने में असमर्थ है, उसे नपुंसकता भी कहा जाता है। दूसरे मामले में, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि पुरुष के वीर्य में शुक्राणुओं की संख्या है या नहीं क्योंकि वह अपने साथी के साथ प्रतिक्रिया करने में असमर्थ है।


ज्यादातर नामर्द मामलों में, इस बीमारी की ये दो स्थितियां एक साथ होती हैं, इसलिए एक बीमारी का इलाज करने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली दवाएं अन्य बीमारियों के इलाज में भी सहायक होती हैं, यही कारण है कि इन दोनों रोगों के अलग-अलग विवरणों का उल्लेख शास्त्रों में भी किया गया है। प्राप्त नहीं किया, नहीं मिला


नामर्द की निशानियां की कुछ प्रमुख बाते:

जो पुरुष संभोग के दौरान यौन क्रिया ठीक से नहीं कर पाते हैं या जल्दी ही डिस्चार्ज हो जाते हैं, फिर उनमें कमी हो जाती है। यह नपुंसकता का लक्षण भी है।

यदि नपुंसकता है, तो पुरुष के लिंग में कठोरता या तो नहीं आती है, तो वह बहुत तेज हो जाता है। संभोग के दौरान लिंग की कठोरता में अचानक कमी।

दरअसल, नपुंसकता का सीधा संबंध इंद्रियों से है। कुछ लोग हिचकिचाते हैं या जागरूकता की कमी है, वे इसके बारे में सही जानकारी प्राप्त करने में असमर्थ हैं।

हालांकि, पुराने लोगों में नपुंसकता अधिक आम है, जो महिलाओं के पास जाने पर पुरुषों को घबराहट का कारण बनाती है। जैसे-जैसे हम उम्र में कामवासना कम होने लगती है।

वे पुरुष जो सेक्स क्रिया करने में रुचि नहीं रखते हैं और जिनके पास उत्साह नहीं है, वे पूरी तरह से नपुंसक हैं। जबकि वे पुरुष जो एक बार उत्तेजित हो जाते हैं लेकिन अक्सर घबराहट या किसी अन्य कारण से शांत हो जाते हैं, उन्हें आंशिक यूनुस कहा जाता है।

संभोग के दौरान या उससे पहले घबराहट, क्योंकि ऐसे लोगों में आत्मविश्वास की कमी होती है और उनमें एक डर होता है।

संभोग के दौरान लिंग की कठोरता में अचानक कमी।

नपुंसकता के कारण पुरुष का लिंग सामान्य से छोटा हो जाता है, जिससे पुरुष ठीक से संभोग करने में असमर्थ हो जाता है।

नपुंसक लोगों में आत्म-विश्वास का अभाव। अक्सर ऐसे लोग भीड़ से डरते हैं और महिलाओं से बात करने में कठिनाई होती है।


*, नपुंसक एक ऐसा योग होता है कि जिस किसी भी पुरुष या स्त्री की जन्म कुंडली में यह योग बनता है वह अपने जीवन में संतान सुख की प्राप्ति नहीं कर सकता या यूं कहें कि वह संतान उत्पन्न करने के योग्य नहीं होता है।


*, और यह स्थिति जन्मजात भी जातक के अंदर हो सकती है या जीवन के किसी भी उम्र में शारीरिक दुर्घटना या शारीरिक हारमोंस की कमी भी इसका कारण हो सकता है।


*, नपुंसक योग का प्रथम सुत्र इस प्रकार है कि यदि किसी भी जातक की जन्मकुंडली में शुक्र वृष या तुला राशि का होकर सप्तम भाव में विद्यमान हो, और उसी जातक की जन्मकुंडली में बुध और शनि युति कुंडली के प्रथम, पंचम अथवा दशम भाव में विद्यमान हो तथा शुक्र के अंश वृद्ध, मृत या बाल अवस्था के हो ऐसे जातक के जीवन में नपुंसक योग बनता है और ऐसा जातक संतान उत्पत्ति के योग्य नहीं होता है।


*, इसी प्रकार नपुंसक योग का दूसरा सुत्र यह कि यदि जातक की जन्म कुंडली में लग्न विषम राशि का हो, चंद्रमा भी विषम राशि में विद्यमान हो और शुक्र भी विषम राशि में विद्यमान हो तथा जन्म नक्षत्र भी नपुंसक हो अर्थात बालक का जन्म नक्षत्र मूल, शतभिषा, मृगशिरा इनमें से एक हो क्योंकि ज्योतिष शास्त्र में 27 नक्षत्र होते हैं जिनमें से 12 नक्षत्र पुरुष और 12 नक्षत्र स्त्री होते हैं बचें शेष तीन नक्षत्र नपुंसक होते हैं जिनका नाम मूल, शतभिषा और मृगशिरा है। इस प्रकार जिस किसी भी जातक की जन्मकुंडली में लग्न, चंद्र, शुक्र विषम राशि में हो और जन्म नक्षत्र नपुंसक हो उस स्थिति में जातक की कुंडली में नपुंसक योग बनता है और ऐसा जातक संतान सुख प्राप्त नहीं कर सकता है।


५, नपुंसक के योग का तीसरा सूत्र इस प्रकार है कि यदि जन्मकुंडली के किसी भी भाव में शुक्र विद्यमान हो और शुक्र से षष्टम अथवा आठवें भाव में शनि विद्यमान हो उस स्थिति में भी नपुंसक योग का निर्माण होता है।


*, इस योग की चतुर्थ कंडीशन यह होती है कि यदि जन्म कुंडली के अष्टम भाव में शुक्र और शनि की युति हो उस स्थिति में 50% जातक के जीवन में नपुंसकता होती है। और ऐसा जातक अधिकतर  आत्मविश्वास की कमी के कारण अथवा अपनी गलत आदतों के कारणनपुंसकता के शिकार होता है।


*, नपुंसक योग का पंचम सूत्र है कि यदि जन्म कुंडली में शुक्र द्वादश भाव में से किसी भी भाव में विद्यमान हो परंतु शुक्र पर शनि व राहु दोनों की दृष्टि हो उस स्थिति में जातक नपुंसक होता है।


Note-:   जन्म कुंडली में शनी व बुध को नपुंसक ग्रह माना गया है। क्योंकि शनि वृद्ध ग्रह है और बुध कुमार ग्रह है इस कारण से ज्योतिष में दोनों ही ग्रहों को नपुंसक माना है और जब इन दोनों ग्रह का संबंध शुक्र से बनता है जो कि शुक्र वीर्य का कारक है कामुकता का कारक है तो यह दोनों ग्रह जब शुक्र से संबंध बनाते हैं उस स्थिति में शुक्र को कमजोर करके उसके कार्यत्व वीर्य को कम कर देते हैं। ऐसे जातक नपुंसकता के लक्षण आ जाते हैं अथवा जातक जन्मजात या बाद में नपुंसक हो जाता है।



नपुंसक के योग को कम करने के उपाय -:

१, यदि जातक के जीवन में इस प्रकार की स्थिति बनती है तो सबसे पहले ऐसे जातक को किसी नीम हकीम व झोलाछाप डॉक्टर के चक्कर में नहीं पडकर संबंधित स्पेशलिस्ट डॉक्टर से सलाह लें व चिकित्सक की सलाह से उपचार प्राप्त करें।


२, यदि जन्म कुंडली में यह योग बनता है तो उस स्थिति में जातक को आत्मविश्वास की वृद्धि के लिए भगवान सूर्य देव की उपासना करनी चाहिए, नित्य सूर्य को अर्घ्य देना चाहिए।



नपुंसकता के कारण प्रेम संबंधों और दांपत्य जीवन में तनाव की स्थिति व रिश्तों में अलगाव और तलाक जैसी परिस्थितियां उत्पन्न हो सकती हैं। ज्योतिषशास्त्र के अनुसार व्यक्ति के नपुंसक होने में मंगल, शुक्र, शनि, बुध और सूर्य की स्थिति बहुत महत्वपूर्ण मानी होती है। 


इन ग्रहों का खराब होना जीवन में यौण संबंधों की इच्छा का अंत करने वाला हो सकता है। वैदिक ज्योतिष में ऎसे अनेक योगों के बारे में चर्चा की गई है जिन्हें समझकर व्यक्ति की सेक्स क्षमता और उनके काम व्यवहार को पहचानने में मदद मिलती है।


इस अंक में कुछ ऎसे ही महत्व्पूर्ण योगों की बात कर रहे हैं जिससे आप जान पाएंगे कि किस राशि के व्यक्ति कब नपुंसक हो सकते हैं।

मेष राशिः पौरुष की कमी


इस राशि के व्यक्तियों की काम शक्ति बहुत तीव्र मानी गई हैं क्योंकि यह अग्नि तत्व राशि और साथ ही मंगल के प्रभाव में होते हैं।


लेकिन राशि स्वामी मंगल वक्री होकर कुण्डली में अस्त हो रहा हो तो जातक की काम शक्ति में कमी आती है और वह नपुंसकता से प्रभावित हो सकता है।


वृष राशिः तब नपुंसक हो सकते हैं


जिनका जन्म वृष राशि में होता है उनके अंदर उत्तेजना और धैर्य का अनोखा संगम देखने को मिलता है। लेकिन जब इनके राशि का स्वामी शुक्र विषम राशि में होता है।


साथ ही विषम नवांश में स्थित होकर शनि-चंद्रमा के साथ दृष्टि अथवा युति संबंध बनता है तो व्यक्ति नपुंसकता के योग से प्रभावित हो सकता है।

मिथुन राशिः तब यौन संबंध नहीं बना पाते


इस राशि वालों के लिए नपुंसकता के योग का कारक उनका राशि स्वामी बुध होता है। ज्योतिषशास्त्र में बुध नपंसक ग्रह माना गया है।


इस राशि के व्यक्ति की कुण्डली में बुध अगर मिथुन राशि में बैठा हो और शनि बुध से चौथे स्थान में बैठा हो यानी दसवीं दृष्टि से बुध को देख रहा है तो व्यक्ति के नपुंसक होने की संभावना रहती है।


कर्क राशिः तब नपुंसकता की संभावना प्रबल रहती है


इस राशि के व्यक्ति यौण संबंधों में बहुत अधिक भावनात्मक होते हैं। ज्योतिषशास्त्र के अनुसार इस राशि का स्वामी चन्द्रमा सम राशि में बैठे बुध के साथ संबंध बनाता है तो नपुंसकता की संभावना प्रबल रहती है।


सिंह राशिः यौन संबंध का उत्साह कम हो जाता है


जिनका जन्म सिंह राशि में होता है वह यौन संबंधों के प्रति काफी उत्साहित होते हैं। इनमें हमेशा यौन संबंध की चाह बनी रहती है।


लेकिन जब इनके स्वामी ग्रह सूर्य पीड़ित होते हैं। सूर्य शुक्र के साथ कुंडली में बैठा होता है तो यौन संबंध का उत्साह कम हो जाता है।


कन्या राशिः तब नपुंसकता का योग प्रभावी होता है


इस राशि वालों का प्रेम सौम्यता और मंद रुप में आगे बढ़ने वाला होता है। इनमें नपुंसकता का योग तब प्रभावित होता है जब इनकी कुण्डली में सूर्य पहले घर यानी लग्न में बैठा हो। इसके साथ ही कन्या अथवा मीन राशि में बैठा चन्द्रमा उसे देख रहा हो।


तुला राशिः तब यौन संबंध की क्षमता नहीं रहती


जिनका जन्म तुला राशि में होता है उनमें काम भावना प्रबल रहती है। यह यौण संबंध के लिए पहल करने वाले होते हैं।


लेकिन राशि स्वामी शुक्र के साथ मंगल, शनि या सूर्य का संबंध बनता है तो व्यक्ति नपुंसकता से प्रभावित हो सकता है।


वृश्चिक : तब नपुंसकता की समस्या आ सकती है


इस राशि के व्यक्ति में सबकुछ अनुकूल हो तो प्रेम संबंधों में जल्दबाजी दिखाते हैं। लेकिन जब मंगल व सूर्य एक साथ होते हैं और मंगल वक्री होता है तो नपुंसकता की समस्या आ सकती है।

धनु राशिः तब नहीं रहता प्यार का जोश


इस राशि के व्यक्तियों में प्यार और संबंधों को लेकर काफी गर्म जोशी बनी रहती है।


लेकिन धनु राशि का स्वामी गुरु अगर शनि और राहु से प्रभावित हो रहा है तो व्यक्ति का यौण संबंध के प्रति जोश और उत्साह कम हो जाता है।


मकर राशिः पौरुष शक्ति की कमी हो जाती है


मकर राशि वाले यौण संबंधों में काफी संयमी ओर सहज होते हैं इन्हें सामन्य रुप से प्रेम का प्रदर्शन पसंद आता है। यह प्रेम को समय देने वाले होते है।


लेकिन जब इनके राशि स्वामी का संबंध सूर्य और शुक्र के साथ खराब होता है तो पौरुष शक्ति की कमी हो जाती है।


कुम्भ राशिः तब नपुंसकता का प्रभाव देखा जा सकता है


शनि की इस राशि के व्यक्ति यौन संबंध के प्रति काफी शालीन रहते हैं इनका प्रेम व्यवहार साथी को इनकी ओर आकर्षित करने में सहायक होता है।


लेकिन इस राशि व्यक्ति में तब नपुंसकता का प्रभाव देखा जा सकता है जब कुंभ राशि में बैठे मंगल की दृष्टि मकर और वृष राशि में बैठे सूर्य पर हो।


मीन राशिः तब यौन क्षमता कम हो जाती है


इस राशि का स्वामी गुरु वक्री होकर शुक्र, शनि के साथ संबंध बनाता है तो व्यक्ति में नपुंसकता का प्रभाव आ सकता है।


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